| عنوان | زیر عنوان | سوره | شماره سوره | شماره آیه | توضیحات |
|---|---|---|---|---|---|
| آثار | آثار گناه | البقرة | 2 | 59 | تاثير ظلم و گناه در نزول عذاب الهي |
| آثار | آثار گناه | البقرة | 2 | 81 | كيفر بدى و فراگيرى گناه |
| آثار | آثار گناه | البقرة | 2 | 81 | دوزخ جايگاه بدكاران و گناهكاران |
| آثار | آثار گناه | البقرة | 2 | 95 | تاثير گناه در وحشت و تنفر انسان از مرگ |
| آثار | آثار گناه | آل عمران | 3 | 155 | گنهكارى زمينهساز تاثير وسوسههاى شيطان در آدمي |
| آثار | آثار گناه | آل عمران | 3 | 155 | تاثير گناهان پيشين در فرار گروهي از مسلمانان در جنگ احد |
| آثار | آثار گناه | آل عمران | 3 | 155 | گناهان پيشين انسان زمينهساز ارتكاب گناهان ديگر |
| آثار | آثار گناه | النساء | 4 | 111 | بازگشت عواقب سوء گناه به شخص گناهكار |
| آثار | آثار گناه | المائدة | 4 | 91 | نقش ميخوارگي و قمار در بازدارى انسان از ياد خدا و اقامه نماز |
| آثار | آثار گناه | الشورى | 41 | 30 | تاثير گناه و معصيت در گرفتارى انسان |
| آثار | آثار گناه | الشورى | 41 | 48 | نقش گناه و معصيت در گرفتارى آدمي در دنيا |
| آثار | آثار گناه | الطلاق | 64 | 9 | نقش كفران و گناه در گرفتارى انسانها به عذاب الهي و هلاكت او |
| آثار | آثار گناه | الحاقة | 68 | 48 | بهرهنبردن گناهكاران بيپروا از مواعظ قرآن |
| آثار | آثار گناه | القيامة | 74 | 5 | ميل به گناه و هواپرستي از عوامل مهم تلاش كافران و مجرمان در انكار معاد |
| آثار | آثار گناه | المطففين | 82 | 14 | انكار آيات الهي براثر غلبه تاريكيهاى گناه و تجاوز بر قلب انسان |
| آثار | آثار گناه | المطففين | 82 | 15 | نقش ظلم و گناه و انكار قرآن و قيامت در محروميت از لقاء حق در قيامت |
| آثار | آثار گناه | العصر | 102 | 3 | سقوط ارزش حقيقي انسان دراثر كفر و گناه |
| آشكار | گناه آشكار | النساء | 4 | 50 | دروغ بستن بر خداوند، گناهي آشكار و بزرگ |
| آشكار | گناه آشكار | الانعام | 5 | 120 | ضرورت خوددارى از گناهان پنهان و آشكار |
| آشكار | گناه آشكار | الاحزاب | 32 | 58 | آزار دادن بيدليل مردم مؤمن، بهتان و گناهي آشكار |
| آمرزش | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 52 | نعمت آمرزش گناهان و ضرورت شكرگزارى بر آن |
| آمرزش | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 58 | تاثير استغفار در آمرزش گناهان |
| آمرزش | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 58 | افزايش پاداش نيكوكاران پس از آمرزش گناه آنان |
| آمرزش | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 221 | دعوت انسانها به بهشت و آمرزش گناهان توسط خداوند |
| آمرزش | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 286 | تقاضاى مؤمنان از خداوند براى بخشش و آمرزش گناهان |
| آمرزش | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 16 | تقاضاى پرهيزگاران براى آمرزش گناهانشان |
| آمرزش | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 16 | ملازمنبودن آمرزش گناهان با نجات از عذاب |
| آمرزش | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 133 | دعوت مسلمانان به پيشيجستن از يكديگر براى وصول به آمرزش الهي |
| آمرزش | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 135 | انحصار آمرزش گناهان به خداوند |
| آمرزش | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 136 | آمرزش گناهان پرهيزگاران، پاداش الهي براى آنان |
| آمرزش | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 136 | آمرزش گناه و جاودانگي در بهشت، پاداش اهل عمل |
| آمرزش | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 193 | درخواست خردمندان از خداوند نسبت به آمرزش گناهان و زدودن بدى هاى آنان |
| آمرزش | آمرزش گناه | النساء | 4 | 129 | شرايط آمرزش گناه شوهر در تضييع حقوق برخياز همسران خود |
| آمرزش | آمرزش گناه | الشورى | 41 | 34 | آمرزش گناهان بسيار انسان ازسوى خداوند |
| آمرزش | آمرزش گناه | الاحقاف | 45 | 31 | نقش ايمان در آمرزش گناه و نجات از عذاب |
| آمرزش | آمرزش گناه | محمد | 46 | 2 | نقش ايمان به خدا و رسول اكرم و قرآن و عمل صالح در آمرزش گناه و اصلاح دل |
| آمرزش | آمرزش گناه | محمد | 46 | 3 | نقش پيروى مومنان از حق در آمرزش گناهان و اصلاح دل آنان |
| آمرزش | آمرزش گناه | الفتح | 47 | 5 | آمرزش گناهان مؤمنان با لطف و رحمت پرورگار |
| آمرزش | آمرزش گناه | الفتح | 47 | 29 | وعده خداوند مبني بر آمرزش مومنان نيكوكار و پاداشي بزرگ، براى آنان |
| آمرزش | آمرزش گناه | الفتح | 47 | 29 | نقش ايمان و عمل در رستگارى انسان و آمرزش گناهان |
| آمرزش | آمرزش گناه | الصف | 60 | 12 | بخشش گناهان و ورود به باغهاى باصفاى بهشت، پاداش جهاد در راه خدا با مال و جان |
| آمرزش | آمرزش گناه | التحريم | 65 | 8 | بخشش گناهان و ورود به بهشت در پي توبه و بازگشت به خدا |
| آمرزش | آمرزش گناهان | النساء | 4 | 96 | آمرزش گناهان مجاهدان و نزول رحمت الهي بر آنان |
| آمرزش | آمرزش گناهان | النساء | 4 | 110 | آمرزش الهي درپي استغفار انسان از كارهاى زشت خويش |
| آمرزش | آمرزش گناهان | النساء | 4 | 168 | آمرزش گناهان، زمينه ساز هدايت انسان ازسوى خداوند |
| آمرزش | آمرزش گناهان | المائدة | 4 | 12 | تاثير نماز، زكات، انفاق و ايمان به پيامبران در آمرزش گناهان |
| آمرزش | آمرزش گناهان | ابراهيم | 13 | 10 | ارسال رسولان به منظور آمرزش گناهان و مهلت دادن به مردم تا زماني مقرر |
| آمرزش | آمرزش گناهان | الزمر | 38 | 53 | آمرزش خداوند درباره تمام گناهان و خطاها |
| آمرزش | آمرزش گناهان | الشورى | 41 | 30 | لطف خداوند در آمرزش و چشمپوشي از گناهان |
| آمرزش | آمرزش گناهان | الطلاق | 64 | 5 | بخشش گناهان درپي پرهيزگارى و خداترسي |
| آمرزش | آمرزش گناهان | البروج | 84 | 10 | آمرزش شديدترين گناهان ازسوى خدا درصورت توبه |
| اجتماعي | گناه اجتماعي | الاعراف | 6 | 164 | مسئوليت انسان درمقابل وقوع گناه در جامعه |
| احساس | احساس گناه | يوسف | 11 | 9 | احساس گناه و شرمندگي برادران يوسف از نقشههاى شيطاني خود |
| ارتباط | ارتباط گناهان | آل عمران | 3 | 155 | گناهان پيشين انسان زمينهساز ارتكاب گناهان ديگر |
| استغفار | استغفار از گناه | البقرة | 2 | 199 | فرقهگرايي و تفرقهافكني در صفوف مسلمين گناهي بزرگ و نيازمند استغفار |
| استغفار | استغفار از گناه | آل عمران | 3 | 135 | استغفار پرهيزگاران پس از ارتكاب گناه |
| استغفار | استغفار از گناه | آل عمران | 3 | 147 | شايستگي استغفار از گناهان و خطاها |
| اسرائيل | گناهان بني اسرائيل | الاعراف | 6 | 161 | وعده خداوند به بنياسرائيل درمورد بخشش گناهانشان درصورت عمل به دستورات او |
| اصرار | اصرار بر گناه | البقرة | 2 | 275 | جاودانگي انسان در آتش دوزخ به سبب اصرار بر انجام گناهان |
| اصرار | اصرار بر گناه | آل عمران | 3 | 135 | نقش تقوا در پرهيز از اصرار آگاهانه بر گناه |
| اصرار | اصرار بر گناه | الواقعة | 55 | 46 | نقش اصرار بر گناه در هلاكت و شقاوت انسان در آخرت |
| اعتراف | اعتراف به گناه | التوبة | 8 | 102 | تاثير اعتراف به گناه در بخشودگي آن ازسوى خداوند |
| امداد | امداد گناهكاران | الاعراف | 6 | 202 | كشاندن كافران به گمراهي توسط شياطين |
| انتقال | انتقال گناه | المائدة | 4 | 29 | انتقال گناهان مقتول به قاتل درصورت ناحق بودن قتل |
| بخشش | بخشش گناه | آل عمران | 3 | 134 | تاثير تقوا در بخشش گناه و خطاى ديگران |
| بخشش | بخشش گناه | آل عمران | 3 | 155 | بخشش خطاها و گناهان مسلمانان در جنگ احد |
| بخشش | بخشش گناه | النساء | 4 | 31 | بخشش گناهان صغيره درصورت خوددارى از گناهان كبيره |
| بخشش | بخشش گناه | النساء | 4 | 48 | بخشوده شدن تمامي گناهان بجز شرک ازسوى خداوند |
| بخشش | بخشش گناه | النساء | 4 | 64 | جواز توسل به پيامبر (ص) براى بخشش گناهان |
| بخشش | بخشش گناه | النساء | 4 | 116 | اختيار و آزادى خداوند در بخشش گناهان هر يک از بندگان كه خواهد |
| بخشش | بخشش گناه | المائدة | 4 | 93 | عفو گناهان انجامشده ازسوى مردم قبل از اعلام حرمت آنها |
| بخشش | بخشش گناه | المائدة | 4 | 93 | عفو گناه شرابخوارى و استفاده از پولهاى به دست آمده از قمار و بخت آزمايي قبل از اعلام تحريم آنها |
| بخشش | بخشش گناه | البقرة | 2 | 284 | بخشش گناهان بندگان برطبق مشيت الهي |
| بخشش | بخشش گناهان | البقرة | 2 | 271 | تاثير انفاق در بخشوده شدن گناهان انسان |
| بخشش | بخشش گناهان | النساء | 4 | 116 | امكان بخشش تمامي گناهان غيراز گناه شرک |
| بخشش | بخشش گناهان | النساء | 4 | 149 | بخشش گناهان بندگان ازسوى خداوند با وجود قدرت او |
| بخشش | بخشش گناهان | النساء | 4 | 153 | بخشش گناه گوساله پرستي بنياسرائيل |
| بخشش | بخشش گناهان | المائدة | 4 | 45 | بخشش گناهان انسان درصورت چشمپوشي از حق قصاص |
| بخشش | بخشش گناهان | المائدة | 4 | 65 | بخشوده شدن گناهان آدمي، مقدمه ورود او در بهشت |
| بخشش | بخشش گناهان | المائدة | 4 | 118 | قدرت و حكمت خداوند در بخشش گناهان |
| بخشودگي | بخشودگي گناه | التوبة | 8 | 102 | تاثير اعتراف به گناه در بخشودگي آن ازسوى خداوند |
| بخشودن | بخشودن گناه | طه | 19 | 73 | بخشوده شدن گناهان كافر بعداز ايمان آوردن |
| بدعت گذارى | گناه بدعت گذارى | الشورى | 41 | 14 | مسئوليت بدعتگذارى در دين درقبال نسلهاى آينده |
| بدعت گذارى | گناه بدعت گذارى | الشورى | 41 | 21 | عظمت گناه شرکورزيدن به خدا و بدعتگذارى در دين |
| بزرگ | بزرگترين گناه | النساء | 4 | 48 | شرک، باترين و بزرگترين گناهان |
| بزرگ | بزرگترين گناه | يونس | 9 | 17 | گناه بزرگ دروغ بستن به خدا و تكذيب آيات او |
| بزرگ | گناه بزرگ | البقرة | 2 | 114 | گناه بزرگ ترويج شرک و الحاد و جلوگيرى از توحيد |
| بزرگ | گناه بزرگ | البقرة | 2 | 217 | بزرگي گناه اخراج اهالي مكه |
| بزرگ | گناه بزرگ | البقرة | 2 | 219 | بزرگي گناه شرابخوارى و قمار |
| بزرگ | گناه بزرگ | البقرة | 2 | 283 | گناه بزرگ خيانت در امانت و كتمان شهادت |
| بزرگ | گناه بزرگ | آل عمران | 3 | 167 | اهميت جهاد در اسلام و عظمت گناه شركت نكردن در آن |
| بزرگ | گناه بزرگ | النساء | 4 | 50 | دروغ بستن بر خداوند، گناهي آشكار و بزرگ |
| بزرگ | گناه بزرگ | النساء | 4 | 112 | گناه آشكار نسبت دادن خطاها و گناهان خويش به ديگران |
| بزرگ | گناه بزرگ | النساء | 4 | 112 | سنگيني گناه و مسئوليت تهمت زدن به افراد بيگناه |
| بزرگ | گناه بزرگ | الانعام | 5 | 93 | بزرگي گناه ادعاى دروغين پيامبرى |
| بزرگ | گناه بزرگ | الانعام | 5 | 93 | بزرگي گناه بدعت در دين |
| بزرگ | گناه بزرگ | الانعام | 5 | 93 | بزرگي گناه ادعاى تشريع ديني درمقابل دين خدا |
| بزرگ | گناه بزرگ | النحل | 15 | 25 | گناه سنگين خرافه انگاران وحي |
| بزرگ | گناه بزرگ | الاسراء | 16 | 31 | فرزندكشي گناهي بس بزرگ |
| بزرگ | گناه بزرگ | مريم | 18 | 90 | عظمت گناه اسناد فرزند به خداوند |
| بزرگ | گناه بزرگ | مريم | 18 | 91 | عظمت گناه اسناد فرزند به خداوند |
| بزرگ | گناه بزرگ | طه | 19 | 100 | سنگيني گناه اعراض از قرآن در قيامت |
| بزرگ | گناه بزرگ | الفرقان | 24 | 11 | گناه بسيار بزرگ مسئول اصلي شايعهسازى بر عليه فردى مسلمان |
| بزرگ | گناه بزرگ | النور | 23 | 12 | گناه بزرگ تاثيرپذيرى از شايعه و سوءظن به مسلمان |
| بزرگ | گناه بزرگ | النور | 23 | 19 | تاكيد فوقالعاده درمورد بزرگي گناه اشاعه فحشاء |
| بزرگ | گناهان بزرگ | النجم | 52 | 32 | ضرورت پرهيز از گناهان بزرگ و ارتكاب فواحش |
| بعهده گرفتن | بعهده گرفتن گناه | النجم | 52 | 38 | عدم مجازات هيچكس به سبب گناه و جرم ديگرى |
| بعهده گرفتن | بعهده گرفتن گناه | النجم | 52 | 38 | بي نتيجه بودن بعهده گرفتن بار گناه ديگران |
| بندگان | گناه بندگان | الاسراء | 16 | 17 | آگاهي خداوند از گناهان بندگان |
| بي گناهي | بي گناهي هارون | الاعراف | 6 | 150 | بيگناهي هارون در قضيه گوساله پرستي بنياسرائيل |
| بي گناهي | بي گناهي يوسف | يوسف | 11 | 28 | ثابت شدن بيگناهي يوسف از طريق پيراهن او |
| بي گناهي | بي گناهي يوسف | يوسف | 11 | 50 | درخواست يوسف از پادشاه مصر براى تحقيق و اثبات بيگناهي خود |
| بي گناهي | بي گناهي يوسف | يوسف | 11 | 50 | خوددارى يوسف از خروج از زندان قبل از اثبات بيگناهي خود |
| بي گناهي | بي گناهي يوسف | يوسف | 11 | 54 | اثبات بيگناهي و پاكدامني يوسف و برگزيدن او به سمت كارگذار خاص شاه مصر |
| بي گناهي | سوگند به بي گناهي | يوسف | 11 | 73 | سوگند برادران يوسف بر بيگناهي خود |
| پافشارى | پافشارى در گناه | العنكبوت | 28 | 40 | عذاب آدمي بدنبال پافشارى بر گناهان و خطايا |
| پاكي | پاكي از گناه | هود | 10 | 114 | تاثير نماز در پايش روح از آلودگي گناه |
| پرهيز | پرهيز از گناه | البقرة | 2 | 181 | تاثير توجه به آگاهي خداوند به اعمال در پرهيز از گناه |
| پرهيز | پرهيز از گناه | البقرة | 2 | 203 | تاثير ياد قيامت در پرهيزگارى و دورى از گناهان |
| پرهيز | پرهيز از گناه | النساء | 4 | 31 | بخشش گناهان صغيره درصورت خوددارى از گناهان كبيره |
| پرهيز | پرهيز از گناه | النساء | 4 | 31 | پاداش پرهيز و خوددارى از انجام گناهان كبيره |
| پرهيز | پرهيز از گناه | النجم | 52 | 32 | ضرورت پرهيز از گناهان بزرگ و ارتكاب فواحش |
| پرهيزگار | گناه پرهيزگاران | آل عمران | 3 | 136 | آمرزش گناهان پرهيزگاران، پاداش الهي براى آنان |
| پنهان | گناه پنهان | الانعام | 5 | 120 | ضرورت خوددارى از گناهان پنهان و آشكار |
| پي | جهنم در پي گناه | يس | 35 | 63 | هشدار خداوند درباره جهنم به كافران و مشركان و گنهكاران |
| تبديل | تبديل يافتن گناهان | الفرقان | 24 | 70 | تبديل گناهان به حسنات درپي توبه و ايمان و عمل صالح |
| تبديل | تبديل يافتن گناهان | الفرقان | 24 | 71 | رفع تعجب از تبديل گناهان به حسنات درسايه توبه |
| تحريم | تحريم گناه | الاعراف | 6 | 33 | تحريم گناه و ستم و سركشي و شرک |
| تحريم | گناهان پيش از تحريم | المائدة | 4 | 93 | عفو گناهان انجامشده ازسوى مردم قبل از اعلام حرمت آنها |
| تحريم | گناهان پيش از تحريم | المائدة | 4 | 93 | عفو گناه شرابخوارى و استفاده از پولهاى به دست آمده از قمار و بخت آزمايي قبل از اعلام تحريم آنها |
| ترک | ترک گناه | الشورى | 41 | 37 | نقش ترک گناه و زشتكارى در برخوردارى از نعمتهاى آخرتي |
| تفرقه افكني | گناه تفرقه افكني | البقرة | 2 | 199 | فرقهگرايي و تفرقهافكني در صفوف مسلمين گناهي بزرگ و نيازمند استغفار |
| تكرار | تكرار گناه | المائدة | 4 | 95 | ضرورت پرهيز از تكرار گناه پس از اداى كفاره آن |
| تهمت | گناه تهمت | النساء | 4 | 112 | گناه آشكار نسبت دادن خطاها و گناهان خويش به ديگران |
| تهمت | گناه تهمت | النساء | 4 | 112 | سنگيني گناه و مسئوليت تهمت زدن به افراد بيگناه |
| توبه | توبه از گناه | آل عمران | 3 | 135 | يادكردن خداوند پس از انجام گناه، منشاء استغفار و توبه |
| توبه | توبه از گناه | التحريم | 65 | 8 | بخشش گناهان و ورود به بهشت در پي توبه و بازگشت به خدا |
| توبه | توبه از گناه | القلم | 67 | 28 | توبه و تنبه صاحبان باغهاى آسيب ديده به خاطر غرور و امساک آنان از انفاق |
| توبه | گناه و توبه | البقرة | 2 | 54 | تناسب شيوه توبه با عظمت و بزرگي گناه |
| توجيه | توجيه گناه | القيامة | 74 | 14 | توجيهگرى انسان در ارتكاب گناهان و سرپوش گذاشتن بر آنها |
| تيرگي | تيرگي گناه | يونس | 9 | 27 | ظهور تيرگي و ذلت گناه در سيماى گنهكاران |
| جبران | جبران گناه | البقرة | 2 | 160 | جبران زيانهاى اجتماعي گناه شرط پذيرفته شدن توبه |
| جبران | جبران گناهان | ابراهيم | 13 | 31 | قابل جبراننبودن تقصيرها و گناهان در روز قيامت |
| جريمه | جريمه گناه | المائدة | 4 | 95 | كفاره، جريمهاى براى مخالفت با فرمان الهي درموارد معين |
| جريمه | جريمه گناه | المجادلة | 57 | 3 | كفاره گناه جريمهاى براى جلوگيرى از تكرار آن |
| جمعي | گناه جمعي | الانعام | 5 | 6 | تاثير گناهان اجتماعي در نابودى جوامع |
| جنگ | گناه جنگ | البقرة | 2 | 217 | بزرگي گناه جنگ و كارزار در ماههاى حرام |
| جهنم | جهنم در پي گناه | يس | 35 | 63 | هشدار خداوند درباره جهنم به كافران و مشركان و گنهكاران |
| حب | گناه در حب | البقرة | 2 | 197 | لزوم پرهيز از تمامي گناهان در حال احرام |
| خوددارى | خوددارى از گناه | الانعام | 5 | 120 | ضرورت خوددارى از گناهان پنهان و آشكار |
| دعوت | دعوت به گناه | البقرة | 2 | 169 | دعوت انسان به انجام كارهاى زشت ازسوى شيطان |
| دعوت | دعوت به گناه | ابراهيم | 13 | 22 | دعوت انسان به شرک و گناه از سوى شيطان و اجابت او از سوى مردم |
| ذلت | ذلت گناه | يونس | 9 | 27 | ظهور تيرگي و ذلت گناه در سيماى گنهكاران |
| رواج | رواج گناه | البقرة | 2 | 268 | تاثير ترک انفاق در رواج گناه و فحشاء در جامعه |
| زدودن | زدودن گناهان | القصص | 27 | 7 | زدودن گناهان ايمان آورندگان و شايسته كاران |
| زمينه | زمينه گناه | الاسراء | 16 | 16 | رفاه و ناز و نعمت زمينه گناه و مفاسد اجتماعي و غفلت از خدا |
| زودودن | زدودن گناهان | الانفال | 7 | 29 | تاثير تقوا در زدودن گناهان و آمرزش انسان |
| سابق | گناهان سابق | النور | 23 | 20 | گرفتارنشدن به كيفر و عواقب گناهان سابق به بركت رحمت و رافت خداوند |
| سبب | سوختن به سبب گناه | يس | 35 | 64 | سوختن مجرمان به سبب كفر و گناهورزى |
| سرانجام | سرانجام گناهكار | النساء | 4 | 111 | بازگشت عواقب سوء گناه به شخص گناهكار |
| سقوط | سقوط در پي گناه | غافر | 39 | 21 | سقوط تمدنها و انسانها درپي گناه و خطا با وجود قدرت و تكنولوژى و ثروت |
| سكوت | سكوت درقبال گناه | المائدة | 4 | 63 | نكوهش علماى يهود و نصارى به خاطر سكونت آنان درقبال گفتار گناهآلود و حرامخوارگي اهل كتاب |
| سوختن | سوختن به سبب گناه | يس | 35 | 64 | سوختن مجرمان به سبب كفر و گناهورزى |
| سوگند | سوگند به بي گناهي | يوسف | 11 | 73 | سوگند برادران يوسف بر بيگناهي خود |
| شادماني | شادماني بر گناه | الانشقاق | 83 | 13 | نقش شادماني بر گناه و عناد و استكبار دربرابر حق در ورود به آتش دوزخ |
| شايسته كاران | گناهان شايسته كاران | القصص | 27 | 7 | زدودن گناهان ايمان آورندگان و شايسته كاران |
| شراب خوارى | گناه شراب خوارى | البقرة | 2 | 219 | بزرگي گناه شرابخوارى و قمار |
| شرک | گناه شرک | النساء | 4 | 48 | شرک، باترين و بزرگترين گناهان |
| شرک | گناه شرک | الشورى | 41 | 21 | عظمت گناه شرک ورزيدن به خدا و بدعتگذارى در دين |
| شوهر | گناه شوهر | النساء | 4 | 129 | شرايط آمرزش گناه شوهر در تضييع حقوق برخي از همسران خود |
| شيوع | شيوع گناه | الاسراء | 16 | 16 | شيوع گناه و مفاسد اجتماعي زمينه نزول عذاب |
| صغيره | گناه صغيره | النساء | 4 | 31 | بخشش گناهان صغيره درصورت خوددارى از گناهان كبيره |
| صغيره | گناه صغيره | النساء | 4 | 31 | تقسيم گناهان در مقايسه با يكديگر به كبيره و صغيره |
| ضرر | ضرر گناه | الاعراف | 6 | 23 | بازگشت زيان گناه به خود انسان |
| ظاهرى | گناه ظاهرى | البقرة | 2 | 284 | مؤاخذه انسان به گناهان ظاهرى و باطني |
| ظلم | ظلم گناهكاران | آل عمران | 3 | 135 | ارتكاب گناه، ظلم بر خويش |
| ظلم | گناه ظلم | الانفال | 7 | 54 | اطلاق ظلم بر تكذيب آيات الهي و گناه |
| عاد | گناه عاد | هود | 10 | 59 | گناه قوم عاد در انكار آيات الهي و مخالفت با پيامبران |
| عاد | گناه عاد | هود | 10 | 59 | گناه قوم عاد در پيروى از زورگويان ستيزهجو |
| عاقبت | عاقبت گناه | الاعراف | 6 | 22 | گناه موجب بروز زشتيهاى انسان |
| عذاب | عذاب درپي گناه | الصافات | 36 | 31 | حتميت عذاب درپي عناد و شرک و عصيان |
| عذاب | عذاب گناهكاران | الاعراف | 6 | 165 | نجات يافتن نهي كنندگان از منكر از عذاب گنهكاران |
| عذاب | عذاب گناهكاران | ابراهيم | 13 | 22 | عذاب دردناک درانتظار فريب خوردگان از شيطان |
| عذاب | عذاب گناهكاران | غافر | 39 | 21 | عذاب الهي براى خطاكاران و گناهكاران |
| عذاب | عذاب گناهكاران | الشعراء | 25 | 202 | فرارسيدن ناگهاني عذاب هولناک خداوند براى گنهكاران |
| علل | علل گناه | الاعراف | 6 | 12 | تكبر ابليس، علت تخلف او از فرمان خدا |
| عنايت | عنايت به گناهكاران | النساء | 4 | 17 | شرايط توبه و بازگشت خداوند به گناهكاران |
| عواقب | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 96 | كيفر امتها و جوامع در اثر كفر و گناه |
| عواقب | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 96 | تاثير كفر و گناه در نابساماني اقتصادى |
| عواقب | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 98 | ضرورت ترس از عذاب ناگهاني خداوند در اثر غفلت و بيهوده گذراني مردمان |
| عواقب | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 100 | مجازات گنهكاران از سوى خداوند |
| عواقب | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 133 | تاثير گناه و جرم در رويگرداني از آيات الهي |
| عواقب | عواقب گناه | التوبة | 8 | 115 | اضلال انسان هدايت شده در اثر گناه |
| عواقب | عواقب گناه | يونس | 9 | 33 | تاثير گناه و تبهكارى مشركان در رويگرداني آنان از توحيد |
| عواقب | عواقب گناه | يونس | 9 | 74 | تاثير گناه و دشمني با حق در ناتواني از درک حقايق ديني |
| عواقب | عواقب گناه | الصافات | 36 | 170 | سرانجام وخيم پوشاندن حق و فرورفتن در خطا و گناه |
| عواقب | عواقب گناهان | النور | 23 | 20 | گرفتارنشدن به كيفر و عواقب گناهان سابق به بركت رحمت و رافت خداوند |
| عوامل | عوامل گناه | البقرة | 2 | 206 | تاثير لببازى و تكبر منافقان در ارتكاب گناه از سوى آنان |
| عوامل | عوامل گناه | آل عمران | 3 | 155 | گناهان پيشين انسان زمينهساز ارتكاب گناهان ديگر |
| عوامل | عوامل گناه | النساء | 4 | 17 | پذيرش توبه انسان درصورت انجام گناه از روى ناداني |
| عوامل | عوامل گناه | الحديد | 56 | 9 | نقش شرک و كفر در قرارگرفتن انسان در تاريكي جهل و عصيان |
| عوامل | عوامل گناهكارى | آل عمران | 3 | 135 | غفلت از خداوند، عامل اصلي ارتكاب گناه |
| فتنه انگيزى | گناه فتنه انگيزى | البقرة | 2 | 217 | سختتربودن گناه فتنه از گناه قتل |
| فراگيرى | فراگيرى گناه | البقرة | 2 | 81 | كيفر بدى و فراگيرى گناه |
| فراموشي | فراموشي گناه | المجادلة | 57 | 6 | فراموشي تدريجي گناهان از ذهن انسان |
| فراموشي | فراموشي گناهان | الكهف | 17 | 57 | رويگرداني از آيات پروردگار و فراموشي گناهان پيشين، بزرگترين ظلم |
| فراموشي | فراموشي گناهان | الكهف | 17 | 57 | پوشش نهادن بر دلها و سنگين كردن گوشها، علت اعراض از آيات پرودگار و فراموشي گناهان پيشين |
| فرزندكشي | گناه فرزندكشي | الاسراء | 16 | 31 | فرزندكشي گناهي بس بزرگ |
| فرقه گرايي | گناه فرقه گرايي | البقرة | 2 | 199 | فرقهگرايي و تفرقهافكني در صفوف مسلمين گناهي بزرگ و نيازمند استغفار |
| فزوني | فزوني گناه | آل عمران | 3 | 178 | فزوني گناهان كفار در نتيجه مهلت يافتن آنان |
| قاتل | گناهان قاتل | المائدة | 4 | 29 | انتقال گناهان مقتول به قاتل درصورت ناحق بودن قتل |
| قتل | قتل بيگناهان | المائدة | 4 | 32 | اهميت قتل انسانهاى بيگناه |
| قتل | گناه قتل | البقرة | 2 | 217 | سختتر بودن گناه فتنه از گناه قتل |
| قمار | گناه قمار | البقرة | 2 | 219 | بزرگي گناه شرابخوارى و قمار |
| گرايش | گرايش به گناه | هود | 10 | 116 | گرايش اكثريت مردم به لذات دنيوى و تبهكارى و گناه |
| گناه | آثار گناه | آل عمران | 3 | 155 | تاثير گناهان پيشين در فرار گروهي از مسلمانان در جنگ احد |
| گناه | آثار گناه | آل عمران | 3 | 155 | گناهان پيشين انسان زمينهساز ارتكاب گناهان ديگر |
| گناه | آثار گناه | النساء | 4 | 111 | بازگشت عواقب سوء گناه به شخص گناهكار |
| گناه | آثار گناه | المائدة | 4 | 91 | نقش ميخوارگي و قمار در بازدارى انسان از ياد خدا و اقامه نماز |
| گناه | آثار گناه | الشورى | 41 | 30 | تاثير گناه و معصيت در گرفتارى انسان |
| گناه | آثار گناه | الشورى | 41 | 48 | نقش گناه و معصيت در گرفتارى آدمي در دنيا |
| گناه | آثار گناه | الطلاق | 64 | 9 | نقش كفران و گناه در گرفتارى انسانها به عذاب الهي و هلاكت او |
| گناه | آثار گناه | الحاقة | 68 | 48 | بهرهنبردن گناهكاران بيپروا از مواعظ قرآن |
| گناه | آثار گناه | القيامة | 74 | 5 | ميل به گناه و هواپرستي از عوامل مهم تلاش كافران و مجرمان در انكار معاد |
| گناه | آثار گناه | المطففين | 82 | 14 | انكار آيات الهي براثر غلبه تاريكيهاى گناه و تجاوز بر قلب انسان |
| گناه | آثار گناه | المطففين | 82 | 15 | نقش ظلم و گناه و انكار قرآن و قيامت در محروميت از لقاء حق در قيامت |
| گناه | آثار گناه | العصر | 102 | 3 | سقوط ارزش حقيقي انسان دراثر كفر و گناه |
| گناه | آثار گناه | البقرة | 2 | 59 | تاثير ظلم و گناه در نزول عذاب الهي |
| گناه | آثار گناه | البقرة | 2 | 81 | كيفر بدى و فراگيرى گناه |
| گناه | آثار گناه | البقرة | 2 | 81 | دوزخ جايگاه بدكاران و گناهكاران |
| گناه | آثار گناه | البقرة | 2 | 95 | تاثير گناه در وحشت و تنفر انسان از مرگ |
| گناه | آثار گناه | آل عمران | 3 | 155 | گنهكارى زمينهساز تاثير وسوسههاى شيطان در آدمي |
| گناه | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 52 | نعمت آمرزش گناهان و ضرورت شكرگزارى بر آن |
| گناه | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 58 | تاثير استغفار در آمرزش گناهان |
| گناه | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 58 | افزايش پاداش نيكوكاران پس از آمرزش گناه آنان |
| گناه | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 221 | دعوت انسانها به بهشت و آمرزش گناهان توسط خداوند |
| گناه | آمرزش گناه | البقرة | 2 | 286 | تقاضاى مؤمنان از خداوند براى بخشش و آمرزش گناهان |
| گناه | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 16 | تقاضاى پرهيزگاران براى آمرزش گناهانشان |
| گناه | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 16 | ملازم نبودن آمرزش گناهان با نجات از عذاب |
| گناه | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 133 | دعوت مسلمانان به پيشيجستن از يكديگر براى وصول به آمرزش الهي |
| گناه | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 135 | انحصار آمرزش گناهان به خداوند |
| گناه | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 136 | آمرزش گناهان پرهيزگاران، پاداش الهي براى آنان |
| گناه | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 136 | آمرزش گناه و جاودانگي در بهشت، پاداش اهل عمل |
| گناه | آمرزش گناه | آل عمران | 3 | 193 | درخواست خردمندان از خداوند نسبت به آمرزش گناهان و زدودن بدىهاى آنان |
| گناه | آمرزش گناه | النساء | 4 | 129 | شرايط آمرزش گناه شوهر در تضييع حقوق برخي از همسران خود |
| گناه | آمرزش گناه | الشورى | 41 | 34 | آمرزش گناهان بسيار انسان ازسوى خداوند |
| گناه | آمرزش گناه | الاحقاف | 45 | 31 | نقش ايمان در آمرزش گناه و نجات از عذاب |
| گناه | آمرزش گناه | محمد | 46 | 2 | نقش ايمان به خدا و رسول اكرم و قرآن و عمل صالح در آمرزش گناه و اصلاح دل |
| گناه | آمرزش گناه | محمد | 46 | 3 | نقش پيروى مومنان از حق در آمرزش گناهان و اصلاح دل آنان |
| گناه | آمرزش گناه | الفتح | 47 | 5 | آمرزش گناهان مؤمنان با لطف و رحمت پرورگار |
| گناه | آمرزش گناه | الفتح | 47 | 29 | وعده خداوند مبني بر آمرزش مومنان نيكوكار و پاداشي بزرگ، براى آنان |
| گناه | آمرزش گناه | الفتح | 47 | 29 | نقش ايمان و عمل در رستگارى انسان و آمرزش گناهان |
| گناه | آمرزش گناه | الصف | 60 | 12 | بخشش گناهان و ورود به باغهاى باصفاى بهشت، پاداش جهاد در راه خدا با مال و جان |
| گناه | آمرزش گناه | التحريم | 65 | 8 | بخشش گناهان و ورود به بهشت در پي توبه و بازگشت به خدا |
| گناه | احساس گناه | يوسف | 11 | 9 | احساس گناه و شرمندگي برادران يوسف از نقشههاى شيطاني خود |
| گناه | استغفار از گناه | البقرة | 2 | 199 | فرقهگرايي و تفرقهافكني در صفوف مسلمين گناهي بزرگ و نيازمند استغفار |
| گناه | استغفار از گناه | آل عمران | 3 | 135 | استغفار پرهيزگاران پس از ارتكاب گناه |
| گناه | استغفار از گناه | آل عمران | 3 | 147 | شايستگي استغفار از گناهان و خطاها |
| گناه | اصرار بر گناه | البقرة | 2 | 275 | جاودانگي انسان در آتش دوزخ به سبب اصرار بر انجام گناهان |
| گناه | اصرار بر گناه | آل عمران | 3 | 135 | نقش تقوا در پرهيز از اصرار آگاهانه بر گناه |
| گناه | اصرار بر گناه | الواقعة | 55 | 46 | نقش اصرار بر گناه در هلاكت و شقاوت انسان در آخرت |
| گناه | اعتراف به گناه | التوبة | 8 | 102 | تاثير اعتراف به گناه در بخشودگي آن ازسوى خداوند |
| گناه | انتقال گناه | المائدة | 4 | 29 | انتقال گناهان مقتول به قاتل درصورت ناحق بودن قتل |
| گناه | بخشش گناه | آل عمران | 3 | 134 | تاثير تقوا در بخشش گناه و خطاى ديگران |
| گناه | بخشش گناه | آل عمران | 3 | 155 | بخشش خطاها و گناهان مسلمانان در جنگ احد |
| گناه | بخشش گناه | النساء | 4 | 31 | بخشش گناهان صغيره درصورت خوددارى از گناهان كبيره |
| گناه | بخشش گناه | النساء | 4 | 48 | بخشوده شدن تمامي گناهان بجز شرک ازسوى خداوند |
| گناه | بخشش گناه | النساء | 4 | 64 | جواز توسل به پيامبر (ص) براى بخشش گناهان |
| گناه | بخشش گناه | النساء | 4 | 116 | اختيار و آزادى خداوند در بخشش گناهان هر يک از بندگان كه خواهد |
| گناه | بخشش گناه | المائدة | 4 | 93 | عفو گناهان انجام شده ازسوى مردم قبل از اعلام حرمت آنها |
| گناه | بخشش گناه | المائدة | 4 | 93 | عفو گناه شرابخوارى و استفاده از پولهاى به دست آمده از قمار و بخت آزمايي قبل از اعلام تحريم آنها |
| گناه | بخشش گناه | البقرة | 2 | 284 | بخشش گناهان بندگان برطبق مشيت الهي |
| گناه | بخشودگي گناه | التوبة | 8 | 102 | تاثير اعتراف به گناه در بخشودگي آن ازسوى خداوند |
| گناه | بخشودن گناه | طه | 19 | 73 | بخشوده شدن گناهان كافر بعداز ايمان آوردن |
| گناه | بزرگترين گناه | النساء | 4 | 48 | شرک، باترين و بزرگترين گناهان |
| گناه | بزرگترين گناه | يونس | 9 | 17 | گناه بزرگ دروغ بستن به خدا و تكذيب آيات او |
| گناه | بعهده گرفتن گناه | النجم | 52 | 38 | عدم مجازات هيچكس به سبب گناه و جرم ديگرى |
| گناه | بعهده گرفتن گناه | النجم | 52 | 38 | بي نتيجه بودن به عهده گرفتن بار گناه ديگران |
| گناه | پافشارى در گناه | العنكبوت | 28 | 40 | عذاب آدمي بدنبال پافشارى بر گناهان و خطايا |
| گناه | پاكي از گناه | هود | 10 | 114 | تاثير نماز در پايش روح از آلودگي گناه |
| گناه | پرهيز از گناه | البقرة | 2 | 181 | تاثير توجه به آگاهي خداوند به اعمال در پرهيز از گناه |
| گناه | پرهيز از گناه | البقرة | 2 | 203 | تاثير ياد قيامت در پرهيزگارى و دورى از گناهان |
| گناه | پرهيز از گناه | النساء | 4 | 31 | بخشش گناهان صغيره درصورت خوددارى از گناهان كبيره |
| گناه | پرهيز از گناه | النساء | 4 | 31 | پاداش پرهيز و خوددارى از انجام گناهان كبيره |
| گناه | پرهيز از گناه | النجم | 52 | 32 | ضرورت پرهيز از گناهان بزرگ و ارتكاب فواحش |
| گناه | تحريم گناه | الاعراف | 6 | 33 | تحريم گناه و ستم و سركشي و شرک |
| گناه | ترک گناه | الشورى | 41 | 37 | نقش ترک گناه و زشتكارى در برخوردارى از نعمتهاى آخرتي |
| گناه | تكرار گناه | المائدة | 4 | 95 | ضرورت پرهيز از تكرار گناه پس از اداى كفاره آن |
| گناه | توبه از گناه | آل عمران | 3 | 135 | يادكردن خداوند پس از انجام گناه، منشاء استغفار و توبه |
| گناه | توبه از گناه | التحريم | 65 | 8 | بخشش گناهان و ورود به بهشت در پي توبه و بازگشت به خدا |
| گناه | توبه از گناه | القلم | 67 | 28 | توبه و تنبه صاحبان باغهاى آسيب ديده به خاطر غرور و امساک آنان از انفاق |
| گناه | توجيه گناه | القيامة | 74 | 14 | توجيهگرى انسان در ارتكاب گناهان و سرپوش گذاشتن بر آنها |
| گناه | تيرگي گناه | يونس | 9 | 27 | ظهور تيرگي و ذلت گناه در سيماى گنهكاران |
| گناه | جبران گناه | البقرة | 2 | 160 | جبران زيانهاى اجتماعي گناه شرط پذيرفته شدن توبه |
| گناه | جريمه گناه | المائدة | 4 | 95 | كفاره، جريمهاى براى مخالفت با فرمان الهي درموارد معين |
| گناه | جريمه گناه | المجادلة | 57 | 3 | كفاره گناه جريمهاى براى جلوگيرى از تكرار آن |
| گناه | جهنم در پي گناه | يس | 35 | 63 | هشدار خداوند درباره جهنم به كافران و مشركان و گنهكاران |
| گناه | خوددارى از گناه | الانعام | 5 | 120 | ضرورت خوددارى از گناهان پنهان و آشكار |
| گناه | دعوت به گناه | البقرة | 2 | 169 | دعوت انسان به انجام كارهاى زشت ازسوى شيطان |
| گناه | دعوت به گناه | ابراهيم | 13 | 22 | دعوت انسان به شرک و گناه از سوى شيطان و اجابت او از سوى مردم |
| گناه | ذلت گناه | يونس | 9 | 27 | ظهور تيرگي و ذلت گناه در سيماى گنهكاران |
| گناه | رواج گناه | البقرة | 2 | 268 | تاثير ترک انفاق در رواج گناه و فحشاء در جامعه |
| گناه | زمينه گناه | الاسراء | 16 | 16 | رفاه و ناز و نعمت زمينه گناه و مفاسد اجتماعي و غفلت از خدا |
| گناه | سقوط درپي گناه | غافر | 39 | 21 | سقوط تمدنها و انسانها درپي گناه و خطا با وجود قدرت و تكنولوژى و ثروت |
| گناه | سكوت درقبال گناه | المائدة | 4 | 63 | نكوهش علماى يهود و نصارى به خاطر سكونت آنان درقبال گفتار گناهآلود و حرامخوارگي اهل كتاب |
| گناه | سوختن به سبب گناه | يس | 35 | 64 | سوختن مجرمان به سبب كفر و گناهورزى |
| گناه | شادماني بر گناه | الانشقاق | 83 | 13 | نقش شادماني بر گناه و عناد و استكبار دربرابر حق در ورود به آتش دوزخ |
| گناه | شيوع گناه | الاسراء | 16 | 16 | شيوع گناه و مفاسد اجتماعي زمينه نزول عذاب |
| گناه | ضرر گناه | الاعراف | 6 | 23 | بازگشت زيان گناه به خود انسان |
| گناه | عاقبت گناه | الاعراف | 6 | 22 | گناه موجب بروز زشتيهاى انسان |
| گناه | عذاب درپي گناه | الصافات | 36 | 31 | حتميت عذاب درپي عناد و شرک و عصيان |
| گناه | علل گناه | الاعراف | 6 | 12 | تكبر ابليس، علت تخلف او از فرمان خدا |
| گناه | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 96 | كيفر امتها و جوامع در اثر كفر و گناه |
| گناه | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 96 | تاثير كفر و گناه در نابساماني اقتصادى |
| گناه | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 98 | ضرورت ترس از عذاب ناگهاني خداوند در اثر غفلت و بيهوده گذراني مردمان |
| گناه | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 100 | مجازات گنهكاران از سوى خداوند |
| گناه | عواقب گناه | الاعراف | 6 | 133 | تاثير گناه و جرم در رويگرداني از آيات الهي |
| گناه | عواقب گناه | التوبة | 8 | 115 | اضلال انسان هدايت شده در اثر گناه |
| گناه | عواقب گناه | يونس | 9 | 33 | تاثير گناه و تبهكارى مشركان در رويگرداني آنان از توحيد |
| گناه | عواقب گناه | يونس | 9 | 74 | تاثير گناه و دشمني با حق در ناتواني از درک حقايق ديني |
| گناه | عواقب گناه | الصافات | 36 | 170 | سرانجام وخيم پوشاندن حق و فرورفتن در خطا و گناه |
| گناه | عوامل گناه | البقرة | 2 | 206 | تاثير لببازى و تكبر منافقان در ارتكاب گناه از سوى آنان |
| گناه | عوامل گناه | آل عمران | 3 | 155 | گناهان پيشين انسان زمينهساز ارتكاب گناهان ديگر |
| گناه | عوامل گناه | النساء | 4 | 17 | پذيرش توبه انسان درصورت انجام گناه از روى ناداني |
| گناه | عوامل گناه | الحديد | 56 | 9 | نقش شرک و كفر در قرارگرفتن انسان در تاريكي جهل و عصيان |
| گناه | فراگيرى گناه | البقرة | 2 | 81 | كيفر بدى و فراگيرى گناه |
| گناه | فراموشي گناه | المجادلة | 57 | 6 | فراموشي تدريجي گناهان از ذهن انسان |
| گناه | فزوني گناه | آل عمران | 3 | 178 | فزوني گناهان كفار در نتيجه مهلت يافتن آنان |
| گناه | كافران و گناه | يس | 35 | 19 | زياده روى كافران در گناه و شهوات |
| گناه | كيفر گناه | البقرة | 2 | 275 | جاودانگي انسان در آتش دوزخ به سبب اصرار بر انجام گناهان |
| گناه | كيفر گناه | البقرة | 2 | 284 | كيفر بندگان گناهكار برطبق مشيت الهي |
| گناه | كيفر گناه | الانعام | 5 | 120 | حتمي بودن كيفر گناه و نزديک بودن آن |
| گناه | كيفر گناه | الانعام | 5 | 164 | اختصاص كيفر گناه به عامل آن |
| گناه | گرايش به گناه | هود | 10 | 116 | گرايش اكثريت مردم به لذات دنيوى و تبهكارى و گناه |
| گناه | گناه آشكار | النساء | 4 | 50 | دروغ بستن بر خداوند، گناهي آشكار و بزرگ |
| گناه | گناه آشكار | الانعام | 5 | 120 | ضرورت خوددارى از گناهان پنهان و آشكار |
| گناه | گناه آشكار | الاحزاب | 32 | 58 | آزار دادن بيدليل مردم مؤمن، بهتان و گناهي آشكار |
| گناه | گناه اجتماعي | الاعراف | 6 | 164 | مسئوليت انسان درمقابل وقوع گناه در جامعه |
| گناه | گناه ازروى ناداني | النساء | 4 | 17 | پذيرش توبه انسان درصورت انجام گناه از روى ناداني |
| گناه | گناه باطني | البقرة | 2 | 284 | مؤاخذه انسان به گناهان ظاهرى و باطني |
| گناه | گناه بدعت گذارى | الشورى | 41 | 14 | مسئوليت بدعتگذارى در دين درقبال نسلهاى آينده |
| گناه | گناه بدعت گذارى | الشورى | 41 | 21 | عظمت گناه شرک ورزيدن به خدا و بدعتگذارى در دين |
| گناه | گناه بزرگ | البقرة | 2 | 114 | گناه بزرگ ترويج شرک و الحاد و جلوگيرى از توحيد |
| گناه | گناه بزرگ | البقرة | 2 | 217 | بزرگي گناه اخراج اهالي مكه |
| گناه | گناه بزرگ | البقرة | 2 | 219 | بزرگي گناه شرابخوارى و قمار |
| گناه | گناه بزرگ | البقرة | 2 | 283 | گناه بزرگ خيانت در امانت و كتمان شهادت |
| گناه | گناه بزرگ | آل عمران | 3 | 167 | اهميت جهاد در اسلام و عظمت گناه شركت نكردن در آن |
| گناه | گناه بزرگ | النساء | 4 | 50 | دروغ بستن بر خداوند، گناهي آشكار و بزرگ |
| گناه | گناه بزرگ | النساء | 4 | 112 | گناه آشكار نسبت دادن خطاها و گناهان خويش به ديگران |
| گناه | گناه بزرگ | النساء | 4 | 112 | سنگيني گناه و مسئوليت تهمت زدن به افراد بيگناه |
| گناه | گناه بزرگ | الانعام | 5 | 93 | بزرگي گناه ادعاى دروغين پيامبرى |
| گناه | گناه بزرگ | الانعام | 5 | 93 | بزرگي گناه بدعت در دين |
| گناه | گناه بزرگ | الانعام | 5 | 93 | بزرگي گناه ادعاى تشريع ديني درمقابل دين خدا |
| گناه | گناه بزرگ | النحل | 15 | 25 | گناه سنگين خرافه انگاران وحي |
| گناه | گناه بزرگ | الاسراء | 16 | 31 | فرزندكشي گناهي بس بزرگ |
| گناه | گناه بزرگ | مريم | 18 | 90 | عظمت گناه اسناد فرزند به خداوند |
| گناه | گناه بزرگ | مريم | 18 | 91 | عظمت گناه اسناد فرزند به خداوند |
| گناه | گناه بزرگ | طه | 19 | 100 | سنگيني گناه اعراض از قرآن در قيامت |
| گناه | گناه بزرگ | الفرقان | 24 | 11 | گناه بسيار بزرگ مسئول اصلي شايعهسازى بر عليه فردى مسلمان |
| گناه | گناه بزرگ | النور | 23 | 12 | گناه بزرگ تاثيرپذيرى از شايعه و سوءظن به مسلمان |
| گناه | گناه بزرگ | النور | 23 | 19 | تاكيد فوقالعاده درمورد بزرگي گناه اشاعه فحشاء |
| گناه | گناه بندگان | الاسراء | 16 | 17 | آگاهي خداوند از گناهان بندگان |
| گناه | گناه پرهيزگاران | آل عمران | 3 | 136 | آمرزش گناهان پرهيزگاران، پاداش الهي براى آنان |
| گناه | گناه پس از كفاره | المائدة | 4 | 95 | ضرورت پرهيز از تكرار گناه پس از اداى كفاره آن |
| گناه | گناه پس از كفاره | المائدة | 4 | 95 | انتقام گرفتن خداوند از تكرركنندگان گناه پس از پرداخت كفاره |
| گناه | گناه پنهان | الانعام | 5 | 120 | ضرورت خوددارى از گناهان پنهان و آشكار |
| گناه | گناه تفرقه افكني | البقرة | 2 | 199 | فرقهگرايي و تفرقهافكني در صفوف مسلمين گناهي بزرگ و نيازمند استغفار |
| گناه | گناه تهمت | النساء | 4 | 112 | گناه آشكار نسبت دادن خطاها و گناهان خويش به ديگران |
| گناه | گناه تهمت | النساء | 4 | 112 | سنگيني گناه و مسئوليت تهمت زدن به افراد بيگناه |
| گناه | گناه جمعي | الانعام | 5 | 6 | تاثير گناهان اجتماعي در نابودى جوامع |
| گناه | گناه جنگ | البقرة | 2 | 217 | بزرگي گناه جنگ و كارزار در ماههاى حرام |
| گناه | گناه در حب | البقرة | 2 | 197 | لزوم پرهيز از تمامي گناهان در حال احرام |
| گناه | گناه ديگران | الاسراء | 16 | 15 | عدم مجازات افراد درقبال جرائم ديگران |
| گناه | گناه شراب خوارى | البقرة | 2 | 219 | بزرگي گناه شرابخوارى و قمار |
| گناه | گناه شرک | النساء | 4 | 48 | شرک، باترين و بزرگترين گناهان |
| گناه | گناه شرک | الشورى | 41 | 21 | عظمت گناه شرک ورزيدن به خدا و بدعتگذارى در دين |
| گناه | گناه شوهر | النساء | 4 | 129 | شرايط آمرزش گناه شوهر در تضييع حقوق برخي از همسران خود |
| گناه | گناه صغيره | النساء | 4 | 31 | بخشش گناهان صغيره درصورت خوددارى از گناهان كبيره |
| گناه | گناه صغيره | النساء | 4 | 31 | تقسيم گناهان در مقايسه با يكديگر به كبيره و صغيره |
| گناه | گناه ظاهرى | البقرة | 2 | 284 | مؤاخذه انسان به گناهان ظاهرى و باطني |
| گناه | گناه ظلم | الانفال | 7 | 54 | اطلاق ظلم بر تكذيب آيات الهي و گناه |
| گناه | گناه عاد | هود | 10 | 59 | گناه قوم عاد در انكار آيات الهي و مخالفت با پيامبران |
| گناه | گناه عاد | هود | 10 | 59 | گناه قوم عاد در پيروى از زورگويان ستيزهجو |
| گناه | گناه فتنه انگيزى | البقرة | 2 | 217 | سختتربودن گناه فتنه از گناه قتل |
| گناه | گناه فرزندكشي | الاسراء | 16 | 31 | فرزندكشي گناهي بس بزرگ |
| گناه | گناه فرقه گرايي | البقرة | 2 | 199 | فرقهگرايي و تفرقهافكني در صفوف مسلمين گناهي بزرگ و نيازمند استغفار |
| گناه | گناه قتل | البقرة | 2 | 217 | سختتربودن گناه فتنه از گناه قتل |
| گناه | گناه قمار | البقرة | 2 | 219 | بزرگي گناه شرابخوارى و قمار |
| گناه | گناه كافران | آل عمران | 3 | 178 | فزوني گناهان كفار در نتيجه مهلت يافتن آنان |
| گناه | گناه كافران | الانعام | 5 | 31 | بار سنگين گناهان كافران در قيامت |
| گناه | گناه كبيره | النساء | 4 | 31 | بخشش گناهان صغيره درصورت خوددارى از گناهان كبيره |
| گناه | گناه كبيره | النساء | 4 | 31 | پاداش پرهيز و خوددارى از انجام گناهان كبيره |
| گناه | گناه كبيره | النساء | 4 | 31 | تقسيم گناهان در مقايسه با يكديگر به كبيره و صغيره |
| گناه | گناه گوساله پرستي | النساء | 4 | 153 | بخشش گناه گوساله پرستي بنياسرائيل |
| گناه | گناه لوط | الاعراف | 6 | 80 | قوم لوط، آغازگر عمل لواط |
| گناه | گناه مضاعف | النحل | 15 | 25 | خرافه انگاران وحي، مسئول گناهان خود و گناهان پيروان خود |
| گناه | گناه منافقان | البقرة | 2 | 206 | كسب عزت از طريق گناه توسط منافقان |
| گناه | گناه منافقان | البقرة | 2 | 206 | تاثير لببازى و تكبر منافقان در ارتكاب گناه از سوى آنان |
| گناه | گناه نابخشودني | النساء | 4 | 48 | بخشوده شدن تمامي گناهان بجز شرک ازسوى خداوند |
| گناه | گناه و توبه | البقرة | 2 | 54 | تناسب شيوه توبه با عظمت و بزرگي گناه |
| گناه | گناه و كيفر | آل عمران | 3 | 11 | ارتباط گناه با كيفر الهي |
| گناه | مؤاخذه بر گناه | البقرة | 2 | 284 | مؤاخذه انسان به گناهان ظاهرى و باطني |
| گناه | مؤمنان و گناه | الشورى | 41 | 37 | دورى مومنان از گناهان بزرگ و زشتكارىها |
| گناه | ماهيت گناه | النساء | 4 | 110 | ارتكاب گناه، ظلمي بر خويش |
| گناه | مبارزه با گناه | هود | 10 | 78 | نهايت فداكارى لوط در مبارزه با گناه |
| گناه | مجازات گناه | المجادلة | 57 | 4 | تشريع حدودى از سوى خدا براى مجازات و جريمه برخي از گناهان |
| گناه | مجلس گناه | الفرقان | 24 | 72 | حضورپيدانكردن بندگان راستين در مجالس لهو و باطل و گناه |
| گناه | مسابقه در گناه | المائدة | 4 | 62 | پيشيجستن اكثريت اهل كتاب بر يكديگر در گناه، تجاوز و خوردن مال حرام |
| گناه | موانع گناه | آل عمران | 3 | 5 | نقش توجه به نظارت الهي در پرهيز از گناه |
| گناه | موانع گناه | المائدة | 4 | 108 | نقش ترس از خدا و آبرو در دورى از گناه |
| گناه | موانع گناه | هود | 10 | 123 | نقش توجه به علم خدا و خوددارى از گناه |
| گناه | موانع گناه | الحجر | 14 | 69 | مانع بودن تقوى از گناه و فحشاء |
| گناه | ميل به گناه | المطففين | 82 | 12 | انكار قيامت بخاطر ميل به تداوم گناه و تجاوزگرى |
| گناه | نااميدى درپي گناه | الزمر | 38 | 53 | نكوهش نااميدى از فضل و رحمت خداوند درپي خطا و گناه |
| گناه | نتيجه گناه | هود | 10 | 101 | ستم انسان بر خويش دراثر ظلم و گناه |
| گناه | نتيجه گناه | النجم | 52 | 31 | كيفر كافران ازسوى خدا درقبال زشتكردارى آنان |
| گناه | نتيجه گناه | النجم | 52 | 38 | بازگشت نتيجه اعمال نيک و بد انسان به خود او در آخرت |
| گناه | نجات از گناه | يوسف | 11 | 24 | نقش اخلاص در نجات آدمي از ورطه گناه |
| گناه | نجواى به گناه | الواقعة | 55 | 9 | ممنوعيت نجواى به گناه و معصيت |
| گناه | همكارى براى گناه | المائدة | 4 | 2 | لزوم پرهيز مؤمنان از همكارى با همديگر در گناه و تجاوز |
| گناه | وصيت به گناه | البقرة | 2 | 182 | جواز اصلاح وصيت مشتمل بر انحراف و گناه |
| گناهان | آمرزش گناهان | ابراهيم | 13 | 10 | ارسال رسولان به منظور آمرزش گناهان و مهلت دادن به مردم تا زماني مقرر |
| گناهان | آمرزش گناهان | الزمر | 38 | 53 | آمرزش خداوند درباره تمام گناهان و خطاها |
| گناهان | آمرزش گناهان | الشورى | 41 | 30 | لطف خداوند در آمرزش و چشمپوشي از گناهان |
| گناهان | آمرزش گناهان | الطلاق | 64 | 5 | بخشش گناهان درپي پرهيزگارى و خداترسي |
| گناهان | آمرزش گناهان | البروج | 84 | 10 | آمرزش شديدترين گناهان ازسوى خدا درصورت توبه |
| گناهان | آمرزش گناهان | النساء | 4 | 96 | آمرزش گناهان مجاهدان و نزول رحمت الهي بر آنان |
| گناهان | آمرزش گناهان | النساء | 4 | 110 | آمرزش الهي درپي استغفار انسان از كارهاى زشت خويش |
| گناهان | آمرزش گناهان | النساء | 4 | 168 | آمرزش گناهان، زمينه ساز هدايت انسان ازسوى خداوند |
| گناهان | آمرزش گناهان | المائدة | 4 | 12 | تاثير نماز، زكات، انفاق و ايمان به پيامبران در آمرزش گناهان |
| گناهان | ارتباط گناهان | آل عمران | 3 | 155 | گناهان پيشين انسان زمينهساز ارتكاب گناهان ديگر |
| گناهان | بخشش گناهان | البقرة | 2 | 271 | تاثير انفاق در بخشوده شدن گناهان انسان |
| گناهان | بخشش گناهان | النساء | 4 | 116 | امكان بخشش تمامي گناهان غيراز گناه شرک |
| گناهان | بخشش گناهان | النساء | 4 | 149 | بخشش گناهان بندگان ازسوى خداوند با وجود قدرت او |
| گناهان | بخشش گناهان | النساء | 4 | 153 | بخشش گناه گوساله پرستي بنياسرائيل |
| گناهان | بخشش گناهان | المائدة | 4 | 45 | بخشش گناهان انسان درصورت چشمپوشي از حق قصاص |
| گناهان | بخشش گناهان | المائدة | 4 | 65 | بخشوده شدن گناهان آدمي، مقدمه ورود او در بهشت |
| گناهان | بخشش گناهان | المائدة | 4 | 118 | قدرت و حكمت خداوند در بخشش گناهان |
| گناهان | تبديل يافتن گناهان | الفرقان | 24 | 70 | تبديل گناهان به حسنات درپي توبه و ايمان و عمل صالح |
| گناهان | تبديل يافتن گناهان | الفرقان | 24 | 71 | رفع تعجب از تبديل گناهان به حسنات درسايه توبه |
| گناهان | جبران گناهان | ابراهيم | 13 | 31 | قابل جبراننبودن تقصيرها و گناهان در روز قيامت |
| گناهان | زدودن گناهان | القصص | 27 | 7 | زدودن گناهان ايمان آورندگان و شايسته كاران |
| گناهان | زدودن گناهان | الانفال | 7 | 29 | تاثير تقوا در زدودن گناهان و آمرزش انسان |
| گناهان | عواقب گناهان | النور | 23 | 20 | گرفتارنشدن به كيفر و عواقب گناهان سابق به بركت رحمت و رافت خداوند |
| گناهان | فراموشي گناهان | الكهف | 17 | 57 | رويگرداني از آيات پروردگار و فراموشي گناهان پيشين، بزرگترين ظلم |
| گناهان | فراموشي گناهان | الكهف | 17 | 57 | پوشش نهادن بر دلها و سنگين كردن گوشها، علت اعراض از آيات پرودگار و فراموشي گناهان پيشين |
| گناهان | كناره گيرى از گناهان | غافر | 39 | 8 | دعاى فرشتگان براى مؤمنين درباره توفيق اجتناب از گناهان |
| گناهان | گناهان بزرگ | النجم | 52 | 32 | ضرورت پرهيز از گناهان بزرگ و ارتكاب فواحش |
| گناهان | گناهان بني اسرائيل | الاعراف | 6 | 161 | وعده خداوند به بنياسرائيل درمورد بخشش گناهانشان درصورت عمل به دستورات او |
| گناهان | گناهان پس از مرگ | القيامة | 74 | 13 | بازبودن پرونده انسان براى ثبت آثار به يادگار مانده از او پس از مرگ |
| گناهان | گناهان پيش از تحريم | المائدة | 4 | 93 | عفو گناهان انجام شده ازسوى مردم قبل از اعلام حرمت آنها |
| گناهان | گناهان پيش از تحريم | المائدة | 4 | 93 | عفو گناه شرابخوارى و استفاده از پولهاى به دست آمده از قمار و بخت آزمايي قبل از اعلام تحريم آنها |
| گناهان | گناهان سابق | النور | 23 | 20 | گرفتارنشدن به كيفر و عواقب گناهان سابق به بركت رحمت و رافت خداوند |
| گناهان | گناهان شايسته كاران | القصص | 27 | 7 | زدودن گناهان ايمان آورندگان و شايسته كاران |
| گناهان | گناهان قاتل | المائدة | 4 | 29 | انتقال گناهان مقتول به قاتل درصورت ناحق بودن قتل |
| گناهان | گناهان كافر | طه | 19 | 73 | بخشوده شدن گناهان كافر بعداز ايمان آوردن |
| گناهان | گناهان كبيره | الشورى | 41 | 37 | دورى مومنان از گناهان بزرگ و زشتكارىها |
| گناهان | گناهان مؤمنان | القصص | 27 | 7 | زدودن گناهان ايمان آورندگان و شايسته كاران |
| گناهان | گناهان مقتول | المائدة | 4 | 29 | انتقال گناهان مقتول به قاتل درصورت ناحق بودن قتل |
| گناهان | گناهان يهود | النحل | 15 | 118 | تحريمهاى كيفرى خدا نسبت به يهود نتيجه گناهان خودشان |
| گناهان | محوكننده گناهان | مريم | 18 | 60 | توبه و عمل صالح محوكننده گناهان سابق و موجب ورود به بهشت |
| گناهكار | امداد گناهكاران | الاعراف | 6 | 202 | كشاندن كافران به گمراهي توسط شياطين |
| گناهكار | سرانجام گناهكار | النساء | 4 | 111 | بازگشت عواقب سوء گناه به شخص گناهكار |
| گناهكار | ظلم گناهكاران | آل عمران | 3 | 135 | ارتكاب گناه، ظلم بر خويش |
| گناهكار | عذاب گناهكاران | الاعراف | 6 | 165 | نجات يافتن نهي كنندگان از منكر از عذاب گنهكاران |
| گناهكار | عذاب گناهكاران | ابراهيم | 13 | 22 | عذاب دردناک درانتظار فريب خوردگان از شيطان |
| گناهكار | عذاب گناهكاران | غافر | 39 | 21 | عذاب الهي براى خطاكاران و گناهكاران |
| گناهكار | عنايت به گناهكاران | النساء | 4 | 17 | شرايط توبه و بازگشت خداوند به گناهكاران |
| گناهكار | مجازات گناهكاران | الاعراف | 6 | 100 | مجازات گنهكاران از سوى خداوند |
| گناهكارى | عوامل گناهكارى | آل عمران | 3 | 135 | غفلت از خداوند، عامل اصلي ارتكاب گناه |
| گوساله پرستي | گناه گوساله پرستي | النساء | 4 | 153 | بخشش گناه گوساله پرستي بنياسرائيل |
| لوط | گناه لوط | الاعراف | 6 | 80 | قوم لوط، آغازگر عمل لواط |
| مؤاخذه | مؤاخذه بر گناه | البقرة | 2 | 284 | مؤاخذه انسان به گناهان ظاهرى و باطني |
| مؤمن | گناهان مؤمنان | القصص | 27 | 7 | زدودن گناهان ايمان آورندگان و شايسته كاران |
| مؤمن | مؤمنان و گناه | الاعراف | 6 | 87 | دورى مومنان از گناهان بزرگ و زشتكارىها |
| ماهيت | ماهيت گناه | النساء | 4 | 110 | ارتكاب گناه، ظلمي بر خويش |
| مبارزه | مبارزه با گناه | هود | 10 | 78 | نهايت فداكارى لوط در مبارزه با گناه |
| مجازات | مجازات گناه | المجادلة | 57 | 4 | تشريع حدودى از سوى خدا براى مجازات و جريمه برخي از گناهان |
| مجازات | مجازات گناهكاران | الاعراف | 6 | 100 | مجازات گنهكاران از سوى خداوند |
| مجلس | مجلس گناه | الفرقان | 24 | 72 | حضورپيدانكردن بندگان راستين در مجالس لهو و باطل و گناه |
| محوكننده | محوكننده گناهان | مريم | 18 | 60 | توبه و عمل صالح محوكننده گناهان سابق و موجب ورود به بهشت |
| مرگ | گناهان پس از مرگ | القيامة | 74 | 13 | بازبودن پرونده انسان براى ثبت آثار به يادگار مانده از او پس از مرگ |
| مسابقه | مسابقه در گناه | المائدة | 4 | 62 | پيشيجستن اكثريت اهل كتاب بر يكديگر در گناه، تجاوز و خوردن مال حرام |
| مضاعف | گناه مضاعف | النحل | 15 | 25 | خرافه انگاران وحي، مسئول گناهان خود و گناهان پيروان خود |
| مقتول | گناهان مقتول | المائدة | 4 | 29 | انتقال گناهان مقتول به قاتل درصورت ناحق بودن قتل |
| منافق | گناه منافقان | البقرة | 2 | 206 | كسب عزت از طريق گناه توسط منافقان |
| منافق | گناه منافقان | البقرة | 2 | 206 | تاثير لببازى و تكبر منافقان در ارتكاب گناه از سوى آنان |
| موانع | موانع گناه | آل عمران | 3 | 5 | نقش توجه به نظارت الهي در پرهيز از گناه |
| موانع | موانع گناه | المائدة | 4 | 108 | نقش ترس از خدا و آبرو در دورى از گناه |
| موانع | موانع گناه | هود | 10 | 123 | نقش توجه به علم خدا و خوددارى از گناه |
| موانع | موانع گناه | الحجر | 14 | 69 | مانع بودن تقوى از گناه و فحشاء |
| ميل | ميل به گناه | المطففين | 82 | 12 | انكار قيامت بخاطر ميل به تداوم گناه و تجاوزگرى |
| نااميدى | نااميدى درپي گناه | النحل | 15 | 84 | نكوهش نااميدى از فضل و رحمت خداوند درپي خطا و گناه |
| نابخشودني | گناه نابخشودني | الاعراف | 6 | 96 | بخشوده شدن تمامي گناهان بجز شرک ازسوى خداوند |
| ناداني | گناه ازروى ناداني | الاحزاب | 32 | 72 | پذيرش توبه انسان درصورت انجام گناه از روى ناداني |
| نتيجه | نتيجه گناه | هود | 10 | 101 | ستم انسان بر خويش دراثر ظلم و گناه |
| نتيجه | نتيجه گناه | النجم | 52 | 31 | كيفر كافران ازسوى خدا درقبال زشتكردارى آنان |
| نتيجه | نتيجه گناه | النجم | 52 | 38 | بازگشت نتيجه اعمال نيک و بد انسان به خود او در آخرت |
| نجات | نجات از گناه | يوسف | 11 | 24 | نقش اخلاص در نجات آدمي از ورطه گناه |
| نجات | نجات بي گناهان | هود | 10 | 66 | عدالت خداوند در اختصاص مجازات به مجرمان و نجات بيگناهان |
| نجات | نجات بي گناهان | هود | 10 | 67 | عدالت خداوند در مجازات مجرمان و نجات بيگناهان |
| نجوا | نجواى به گناه | النساء | 4 | 114 | ممنوعيت نجواى به گناه و معصيت |
| هارون | بي گناهي هارون | يونس | 9 | 75 | بيگناهي هارون در قضيه گوساله پرستي بنياسرائيل |
| همكارى | همكارى براى گناه | المائدة | 4 | 2 | لزوم پرهيز مؤمنان از همكارى با همديگر در گناه و تجاوز |
| وصيت | وصيت به گناه | البقرة | 2 | 180 | جواز اصلاح وصيت مشتمل بر انحراف و گناه |
| كافر | كافران و گناه | يس | 35 | 19 | زياده روى كافران در گناه و شهوات |
| كافر | گناه كافران | آل عمران | 3 | 178 | فزوني گناهان كفار در نتيجه مهلت يافتن آنان |
| كافر | گناه كافران | الانعام | 5 | 31 | بار سنگين گناهان كافران در قيامت |
| كافر | گناهان كافر | طه | 19 | 73 | بخشوده شدن گناهان كافر بعداز ايمان آوردن |
| كبيره | گناه كبيره | النساء | 4 | 31 | بخشش گناهان صغيره درصورت خوددارى از گناهان كبيره |
| كبيره | گناه كبيره | النساء | 4 | 31 | پاداش پرهيز و خوددارى از انجام گناهان كبيره |
| كبيره | گناه كبيره | النساء | 4 | 31 | تقسيم گناهان در مقايسه با يكديگر به كبيره و صغيره |
| كبيره | گناهان كبيره | الشورى | 41 | 37 | دورى مومنان از گناهان بزرگ و زشتكارىها |
| كفاره | گناه پس از كفاره | المائدة | 4 | 95 | ضرورت پرهيز از تكرار گناه پس از اداى كفاره آن |
| كفاره | گناه پس از كفاره | المائدة | 4 | 95 | انتقام گرفتن خداوند از تكرركنندگان گناه پس از پرداخت كفاره |
| كناره گيرى | كناره گيرى از گناهان | غافر | 39 | 8 | دعاى فرشتگان براى مؤمنين درباره توفيق اجتناب از گناهان |
| كيفر | كيفر گناه | البقرة | 2 | 275 | جاودانگي انسان در آتش دوزخ به سبب اصرار بر انجام گناهان |
| كيفر | كيفر گناه | البقرة | 2 | 284 | كيفر بندگان گناهكار برطبق مشيت الهي |
| كيفر | كيفر گناه | الانعام | 5 | 120 | حتمي بودن كيفر گناه و نزديک بودن آن |
| كيفر | كيفر گناه | الانعام | 5 | 164 | اختصاص كيفر گناه به عامل آن |
| كيفر | گناه و كيفر | آل عمران | 3 | 11 | ارتباط گناه با كيفر الهي |
| يافتن | تبديل يافتن گناهان | الفرقان | 24 | 70 | تبديل گناهان به حسنات درپي توبه و ايمان و عمل صالح |
| يافتن | تبديل يافتن گناهان | الفرقان | 24 | 71 | رفع تعجب از تبديل گناهان به حسنات درسايه توبه |
| يهود | گناهان يهود | المائدة | 4 | 71 | تحريمهاى كيفرى خدا نسبت به يهود نتيجه گناهان خودشان |
| يوسف | بي گناهي يوسف | يوسف | 11 | 50 | ثابت شدن بيگناهي يوسف از طريق پيراهن او |
| يوسف | بي گناهي يوسف | يوسف | 11 | 50 | درخواست يوسف از پادشاه مصر براى تحقيق و اثبات بيگناهي خود |
| يوسف | بي گناهي يوسف | يوسف | 11 | 54 | خوددارى يوسف از خروج از زندان قبل از اثبات بيگناهي خود |
| يوسف | بي گناهي يوسف | يوسف | 11 | 23 | اثبات بيگناهي و پاكدامني يوسف و برگزيدن او به سمت كارگذار خاص شاه مصر |

در پاسخ به این سوال که آیا آیات و روایات منصوص و معتبر در حرمت غنا و موسیقی وجود دارد؟ باید گفت: آن چه از مجموع کلمات فقها و سخنان دانشمندان اسلامی در این زمینه می توان استفاده کرد، این است که غناء، آهنگ های طرب انگیز و لهو باطل است و به عبارت دیگر: غنا آهنگ هایی است که متناسب مجالس فسق و فجور و اهل گناه و فساد می باشد که قوای شهوانی را در انسان تحریک می کند و گاه یک آهنگ هم خودش غنا و لهو و باطل است و هم محتوای آن، به این ترتیب که اشعار عشقی و فساد انگیز را با آهنگ های مطرب بخوانند.
در پاسخ به این سوال که آیا آیات و روایات منصوص و معتبر در حرمت غنا و موسیقی وجود دارد؟ باید گفت: آن چه از مجموع کلمات فقها و سخنان دانشمندان اسلامی در این زمینه می توان استفاده کرد، این است که غناء، آهنگ های طرب انگیز و لهو باطل است و به عبارت دیگر: غنا آهنگ هایی است که متناسب مجالس فسق و فجور و اهل گناه و فساد می باشد که قوای شهوانی را در انسان تحریک می کند و گاه یک آهنگ هم خودش غنا و لهو و باطل است و هم محتوای آن، به این ترتیب که اشعار عشقی و فساد انگیز را با آهنگ های مطرب بخوانند. و گاه تنها آهنگ، غنا است، به این ترتیب که اشعار پرمحتوا یا آیات قرآن و دعا و مناجات را به آهنگی بخوانند که مناسب مجالس لهو لعب است، و در هر دو صورت حرام می باشد.
در خصوص «غنا» و موسیقی حرام، قرآن کریم در برخی آیات به آن پرداخته و مخالفت خود را با غنا و این نوع موسیقی اعلام فرموده است
و در یک بررسی کوتاه، برخی از مفاسد غنا عبارتند از:
الف) تشویق به فساد اخلاق: مجالس غنا معمولاً مرکز انواع مفاسد است و آن چه به این مفاسد دامن می زند همان غنا است.
ب) غافل شدن از یاد خدا: تعبیر به «لهو» که در تفسیر «غنا» در برخی از روایات اسلامی آمده، اشاره به همین حقیقت است که غنا انسان را آن چنان مست شهوات می کند که از یاد خدا غافل می سازد.
ج) غنا آثار زیانباری را بر اعصاب و روان می گذارد؛ غنا و موسیقی لهو در حقیقت یکی از عوامل مهمّ تخدیر اعصاب و روان است و آثار زیانبار غنا و این گونه موسیقی بر اعصاب تا سرحدّ تولید جنون و بر قلب و فشار خون، و تحریکات نامطلوب پیش می رود.[۱]
● حرمت «غنا» در آیات و روایات:
گرچه در قرآن کریم، تنها کلیات مسایل آمده و تبیین جزییات و تعیین مصداق های آن، به پیامبر و امامان ـ علیهم السلام ـ واگذار شده است و مراجع عظام تقلید با توجه به آیات و روایات موجود، احکام را از آن ها استنباط می کنند، ولی در خصوص «غنا» و موسیقی ، قرآن کریم در برخی آیات به آن پرداخته و مخالفت خود را با غنا و این نوع موسیقی اعلام فرموده است از جمله:
▪ آیه ی اول:
«ذلک و من یعظم حرمات الله خیرٌ له عند ربه واحلت لکم الانعام الاماتتلی علیکم فاجتنبوا الرجس من الاوثان واجتنبوا قول الزور»؛[۲] این است ـ آن چه مقرر شده ـ و هر کس مقررات خدا را بزرگ دارد، آن برای او نزد پروردگارش بهتر است و برای شما دام ها ـ چهارپایان ـ حلال شده است، مگر آن چه برشما خوانده می شود؛ پس از پلیدی بت ها و از گفتار باطل اجتناب ورزید».
امام صادق (ع) می فرماید: «الغنا یورث النفاق»؛ «غنا» نفاق را به ارث می گذارد
ابن بصیر می گوید: از امام صادق (ع) از آیه ی «... فاجتنبوا الرجس من الاوثان واجتنبوا قول الزور» سؤال کردم. امام فرمود: منظور «غنا» است.[۳]
زید شَحّام نیز می گوید: از امام صادق (ع) در باره ی تفسیر قول زور پرسیدم، آن حضرت فرمود: منظور از قول زور، غنا است.[۴]
▪ آیه ی دوم:
«ومن الناس من یشتری لهوالحدیث لیضل عن سبیل الله بغیر علم و یتخذها هزوا اولئک لهم عذاب مهین؛[۵] بعضی از مردم، سخنان باطل و بیهوده می خرند تا مردم را از روی جهل و نادانی گمراه سازند و آیات الهی را به استهزاء گیرند، پس برای آنها عذابی خوارکننده است.[۶]
امام صادق (ع) می فرماید: «غنا» از مسایلی است که خداوند متعال وعده ی عذاب بر آن داده است و سپس آیه ی ۶، سوره ی لقمان را تلاوت فرمود.[۷]
«لهوالحدیث» دارای معنای گسترده ای است که هرگونه سخن یا آهنگ های سرگرم کننده و غفلت زا را شامل می شود که موجب گمراهی و بیهودگی انسان می گردد، خواه از قبیل «غنا» و لحن ها و آهنگ های شهوت انگیز و هوس آلود باشد و یا سخنانی باشد که نه از طریق آهنگ، بلکه از طریق محتوا، انسان را به فساد و تباهی بکشاند.[۸]
امام صادق (ع) می فرماید: «مجلس «غنا» و خوانندگی لهو و باطل، مجلسی است که خدا به اهل آن نمی نگرد و این مصداق قول خداوند متعال است که می فرماید: «بعضی از مردم هستند که سخنان بیهوده خریداری می کنند تا مردم را از راه خدا گمراه سازند.»[۹]
امام صادق (ع) می فرماید: «الغنا یورث النفاق»[۱۰] «غنا» نفاق را به ارث می گذارد و در حدیث دیگری امام صادق (ع) می فرماید: «بیت الغناء لا تومن فیه الفجیعة و لا تجاب فیه الدعوة، و لا یدخله الملک»[۱۱] خانه ای که در آن غنا باشد، ایمن از مرگ و مصیبت دردناک نیست و دعا در آن به اجابت نمی رسد و فرشتگان وارد آن نمی شوند.
در حدیثی از جابربن عبدالله از پیامبر اکرم (ص) نقل شده که فرمود: «کان ابلیس اوّل من تغنی»[۱۲] شیطان اوّلین کسی بود که غنا خواند.
ابن مسعود از پیامبر اکرم (ص) نقل می کند که فرمود: «الغناء ینبت النفاق فی القلب کما ینبت الماء البقل»[۱۳] غناء روح نفاق را در قلب پرورش می دهد همان گونه که آب گیاهان را پرورش می دهد.
ابن بصیر می گوید: از امام صادق (ع) از آیه ی «... فاجتنبوا الرجس من الاوثان واجتنبوا قول الزور» سؤال کردم. امام فرمود: منظور «غنا» است.
البته آهنگ ها و آوازهایی که از نظر محتوا (مضمون اشعار) دارای معنایی باشکوه و زیباست و از طرفی خوب و زیبا اجرا می شود و در عین حال تناسب و شباهتی با ساز و آوازهای مجالس لهو، عیش و عشرت و فساد، ندارد گوش دادن به این نوع آهنگ ها اشکال ندارد. سازها و آوازهایی که نسبت به آن ها شک داریم و نمی دانیم آیا از نوع «غنا» (موسیقی مبتذل) است و یا جز موسیقی های مجاز است، احتیاط آن است که به این گونه آهنگ ها نیز گوش داده نشود.[۱۴]
برای آگاهی بیشتر به کتاب های:
۱ـ تفسیر المیزان، علامة طباطبایی، (مؤسسة اعلمی بیروت)، ج ۱۶، ص ۲۰۹، ۲۱۲.
۲ـ تفسیر نمونه، ناصر مکارم شیرازی و دیگران، دارالکتب الاسلامیه، تهران، ج ۱۴، ص ۹۱، و ج ۱۶، ص ۱۱۴؛ ج ۱۷، ص ۱۵، ۲۷.
۳ـ نظری به موسیقی از طریق کتاب و سنّت، مصطفی شریعت موسوی، انتشارات اسماعیلیان، قم.
[۱] ـ ر. ک: ناصر مکارم شیرازی و دیگران، تفسیر نمونه، (تهران، دارالکتب الاسلامیه) ج ۱۷، ص ۲۲.
[۲] ـ سوره ی حج، آیه ی ۳۰.
[۳] ـ سید هاشم الحسینی البحرانی، البرهان فی تفسیر القرآن، (قم، مؤسسه البعثه)، ج ۳، ص ۸۸۱ ـ ۸۸۲.
[۴] ـ همان.
[۵] ـ سوره ی لقمان، آیه ی ۶.
[۶] ـ ر.ک: علامه محمد حسین طباطبایی (ره)، المیزان فی تفسیر القرآن (قم، منشورات جماعه المدرسین فی الحوزه العلمیه،) ج ۱۵ ـ ۱۶، ص ۳۰۹.
[۷] ـ سید هاشم الحسینی، البحرانی، همان.
[۸] ـ ر.ک؛ ناصر مکارم شیرازی و همکاران، تفسیر نمونه (تهران، دارالکتب الاسلامیه) ج ۱۷، ص ۱۵.
[۹] ـ ر.ک: محمدبن یعقوب الکلینی، الکافی (مؤسسه الوفا، للبیروت) ج ۶، ص ۴۴۴.
[۱۰] محمّد محمدی ری شهری، میزان الحکمة، مکتب الاعلام الاسلامی، قم، ج ۷، ص ۳۰۶.
[۱۱] شیخ حر عاملی، وسائل الشیعه، آل البیت، قم، ج ۱۷، ص ۳۶۴، ۳۲۷.
[۱۲] وسائل الشیعه، همان.
[۱۳] محمّد محمدی ری شهری، میزان الحکمة، مکتب الاعلام الاسلامی، قم، ج ۷، ص ۳۰۶.
[۱۴] ـ ر.ک: آیت الله فاضل لنکرانی، جامع المسائل (استفتائات) مطبوعاتی امیر، چاپ دوم، ص ۲۵۲
مشكاه-شماره۵۵
مقدمه
دين مقدس اسلام بهرهبردارى مشروع از نعمتهاى الهى و زيباييهاى زندگى را مباح و روا و اسراف و زيادهروى را حرام و ناروا مىداند و اين بدان جهت است كه مسلمان به تناسب امكانات و توانايى و كارآيى خود، در برابر جامعه مسؤوليت دارد. در اين صورت فرد اسرافكار قهرا از اجراى مسؤوليت و تعهدات اجتماعى خود بازمىماند و از اين رهگذر بر پيكر جامعه ضربه مىزند.
قرآن مجيد اين حقيقت را در ضمن مباحث اجتماعى در قالبهايى زيبا بيان مىكند و با هشدار به پيروان خود مىفرمايد: (و انفقوا فى سبيل الله ولاتلقوا بايديكم الى التهلكة) (۱) يعنى در راه خدا انفاق كنيد و با دستهاى خود، خود را به هلاكت و نابودى نيفكنيد. از اين آيه شريفه چنين استفاده مىشود كه اگر مال در راه خدا و به سود جامعه و رفع نيازمنديهاى مردم مصرف نشود سرنوشت آن جامعه و ملتبه هلاكت و سقوط مىانجامد.
صرفنظر از اهميتخوددارى از اسراف و تبذير در دين از نظر موقعيتخاص كشور اسلامى كه در محاصره حكومتهاى سلطهگر قرار گرفته اگر ما بتوانيم تجملات زندگى را حذف كنيم و رعايت اقتصاد و ميانهروى را در همه حال مدنظر و برنامه عمل قرار دهيم، به استقلال كشور كمك كردهايم و به پيروزى نهايى نزديكتر شدهايم. در نتيجه اين شعار را در اقصى نقاط عالم و دنياى اسلام و بالاخص ايران اسلامى اعلام كردهايم كه ما از تنگناهاى اقتصادى نمىهراسيم و قدرت آن را داريم كه روى پاى خود بايستيم و به هيچ قدرتى جز خداوند متعال متكى نيستيم.
مفهوم اسراف
راغب اصفهانى مىگويد: «السرف تجاوز الحد فى كل فعل يفعله الانسان» (۲) اسراف به معنى تجاوز از حد و معيار در هر كارى است كه از انسان سر بزند، گرچه استعمال آن در موارد زيادهروى در انفاق مال بيشتر است و گاهى به خروج از اعتدال در مقدار خرج مال و زمانى هم به چگونگى بذل مال و مورد آن اطلاق مىشود. اما بنا به مفهوم سخن راغب و روح معنى «كل فعل» و بر پايه شواهد فراوان در قرآن و حديث، اسراف به هر گونه تجاوزكارى و زيادهروى گفته مىشود و در هر حال اسراف عملى است ممنوع و محكوم، و مورد خشم و انزجار خداوند متعال است و از آن به شدت منع شده است.
خداوند در سوره اعراف مىفرمايد: «كلوا واشربوا ولاتسرفوا انه لايحب المسرفين» (۳) بخوريد و بياشاميد و اسراف نكنيد كه خداوند مسرفان را دوست ندارد.
مفهوم تبذير
تبذير برخلاف اسراف و تنها واژهاى اقتصادى است. تبذير از ريشه «بذر» يعنى تفريق و پخش كردن چيزى; اصلش از ريختن و پاشيدن بذر است كه به طور استعاره درباره كسى كه مال خود را بيهوده تلف و پخش مىكند، به كار رفته است و نيز گفته شده است كه تبذير، انفاق مال در راه معصيت است.
با اين توضيحات ملاحظه مىكنيم كه «اسراف» در برابر اقتصاد و ميانه روى قرار دارد و به هرگونه تجاوز از حد، در غير طاعةالله و به قصور از حقالله اطلاق مىشود. در قرآن كريم واژه قصد و مشتقات آن در معانى; راست، متوسط و معتدل به كار رفته است. مانند «واقصد فى مشيك» (۴) در راه رفتن اعتدال را رعايت كن.
فمنهم ظالم لنفسه و منهم مقتصد و منهم سابق بالخيرات (۵) از ميان آنها عدهاى بر خود ستم كردند و عدهاى ميانهرو بودند و عدهاى به اذن خدا در نيكىها از همه «پيشى» گرفتند.
حضرت على(ع) در مورد قصد مىفرمايند: «عليك بالقصد فى الامور» (۶) بر تو باد ميانهروى در كارها. در خطبه همام از نشانههاى متقين و پرهيزگاران مىفرمايد: «و ملبسهم الاقتصاد» (۷) يعنى پوشاكشان ميانه بود، بدين معنى افراط و تفريط در كارها و زندگيشان وجود ندارد.
از مجموع اين نظريهها اين چنين برمىآيد كه بين واژه اسراف به معنى اقتصادى آن با واژه تبذير فرق زيادى وجود ندارد و تنها ممكن است در جهت تمايز بين اين دو واژه گفته شود كه با توجه به خصوصيات تعابير لغتشناسان در معنى تبذير، مقصود از اين واژه تلف كردن و ضايع نمودن مال است و زيادهروى در انفاقات شخصى و امور خيريه را شامل نمىشود، در حالى كه اسراف فراگيرتر از آن و در برگيرنده همه موارد از به هدردادن و زيادهروى در مصارف شخصى و خانوادگى و انفاقهاى مستحب مىباشد. و به عبارت ديگر هر تبذيرى اسراف است ولى هر اسرافى تبذير نيست.
از امام صادق(ع) جمله كوتاهى نقل شده است كه ممكن است همين نكته را از آن استفاده كرد. آن حضرت فرمود: «ان التبذير من الاسراف» يعنى، تبذير از اسراف است. در اين حديثشريف، براى اسراف انواعواقسامى فرض شده، كه تبذير شاخهاى از آن معرفى گرديده است.
اسراف از نظر قرآن
در قرآن كريم واژه «اسراف» و مشتقات آن مكرر به كار رفته است ولى در بيست و سه مورد لفظ «اسراف» استعمال شده كه در هر مورد، مفهومى ويژه دارد. در غالب موارد، مقصود از اسراف جنبههاى اخلاقى، عقيدتى و تجاوز از حدود الهى است، و تنها در چهار مورد جنبه مالى را شامل مىشود كه با دو آيه «تبذير» شش آيه مىشود.
به آيات زير توجه كنيد:
۱ - كذلك زين للمسرفين ماكانوا يعملون. (۸)
اينگونه براى اسرافكاران اعمالشان زينت داده شده است.
۲ - ولا تطيعوا امر المسرفين. (۹)
اطاعت فرمان مسرفان نكنيد.
۳ - ان الله لايهدى من هو مسرف كذاب. (۱۰)
خداوند اسرافكار دروغگو را هدايت نمىكند.
۴ - و ان فرعون لعال فى الارض و انه لمن المسرفين. (۱۱)
و به راستى فرعون برترىجويى (و طغيان) در زمين روا داشت و او از اسرافكاران بود.
اما آياتى كه تنها ظهور در جنبههاى اقتصادى دارند عبارتند از:
۱ - انعام، آيه ۱۴۱.
۲ - اعراف، آيه ۳۱.
۳ - فرقان، آيه۶۷.
۴ - اسراء، آيات۲۷ و ۲۸.
حال به ذكر چند آيه مىپردازيم:
۱ - وات ذاالقربى حقه والمسكين وابن السبيل ولاتبذر تبذيرا ان المبذرين كانوا اخوان الشياطين و كان الشيطان لربه (۱۲) كفورا.
و حق نزديكان را بپرداز! و (همچنين) مستمند و در راهمانده را، و هرگز تبذير مكن چرا كه تبذيركنندگان برادران شيطانند و شيطان كفران (نعمتهاى) پروردگار كرد.
واژه «تبذير»، تنها يك واژه اقتصادى است و در قرآن كريم تنها در همين دو آيه از سوره اسراء به كار رفته است. و شايد در قرآن كريم كمتر مواردى بتوان پيدا كرد كه با چنين لحن تند و شديدى از عملى نهى شده باشد.
۲ - خذوا زينتكم عند كل مسجد و كلوا واشربوا ولا تسرفوا انه لايحب المسرفين (۱۳) زينتخود را در هر مسجد برگيريد و بخوريد و بياشاميد و اسراف نكنيد همانا كه خداوند مسرفان را دوست نمىدارد.
تمامى آيات مربوط به اسراف را مىتوان به طوركلى به دو بخش تقسيم كرد:
۱ - اسراف در مال.
۲ - اسراف در غيرمال.
۱ - اسراف در مال
آيات مربوط به زيادهروى در صرف مال شامل دو بخش است:
الف) اسراف در مصرف شخصى; مىفرمايد: كلوا من ثمره اذا اثمر ... (۱۴) از ميوه آن به هنگامى كه به ثمر مىنشيند بخوريد و حق آن را به هنگام درو بپردازيد، اسراف نكنيد كه خداوند مسرفين را دوست نمىدارد.
بنابراين اسرافى كه در بعد اقتصادى بيشتر مورد توجه است و موجب تضعيف بنيه مالى محرومان و لذتطلبى مسرفان مىشود و از بلاهاى بزرگ اجتماعى است و فقر و محروميتبيشتر به دنبال دارد همين نوع اسراف است كه هر مسلمان با توجه به وظيفه و تعهد و مسؤوليتى كه در برابر خداوند و اجتماع دارد لازم است، در مخارج زندگى خويش رعايت اعتدال را بكند و جدا از اسراف پرهيز نمايد.
ب) اسراف به خاطر ديگران; وقتى انفاق از حد تعادل خارج شود نسبتبه انفاق شونده و انفاقكننده هر دو عوارض سوء و زيانبار خواهد داشت، به اين جهت است كه قرآن مجيد وقتى در آياتى از سوره شريفه فرقان ويژگيهاى مؤمنان و بندگان واقعى را برمىشمارد يكى از آن ويژگيها را اينگونه معرفى مىفرمايد:
اذا انفقوا لم يسرفوا ولم يقتروا و كان بين ذلك قواما; (۱۵) كسانى هستند كه هرگاه انفاق كنند نه اسراف مىكنند و نه سختگيرى، بلكه در ميان اين دو اعتدالى دارند. و نيز قرآن، خطاب به حضرت پيامبر(ص) مىفرمايد: و لا تجعل يدك مغلولة الى عنقك ولا تبسطها كل البسط فتقعد ملوما محسورا (۱۶) هرگز دستت را بر گردنت زنجير مكن (و ترك انفاق و بخشش منما) و بيش از حد آن را مگشا تا مورد سرزنش قرار گيرى و از كار فرومانى، و در همين رابطه حضرت على(ع) مىفرمايند: «ما عال امرء اقتصد» (۱۷) كسى كه ميانهروى پيشه سازد تنگدست نگردد. و حضرت رسول(ص) مىفرمايند: «من اقتصد اغناه الله، و من بذر افقره الله» (۱۸) هر كس در دخل و خرج ميانهروى كند خدا بىنيازش مىكند و هر كس اسراف و تبذير نمايد خداوند فقيرش گرداند.
زيربناى آفرينش بر تعادل گذاشته شده است «و كل شىء عنده بمقدار» (۱۹) و هر چيزى نزد او مقدار معينى دارد و در مورد ديگر مىفرمايد: «انا كل شىء خلقناه بقدر» (۲۰) ما هر چيزى را به اندازه آفريديم.
حساب هر چيزى در پيشگاه خداوند متعال براساس حكمتبالغه او و مصلحت و عدالت و از روى اندازه و بدور از افراط و تفريط است، و اساس حكومت را هم عدالت تشكيل مىدهد و اقامه عدل از اهداف مهم بعثت انبياى عظام الهى بوده است تا آنجا كه معيار مالكيت مشروع را عدم زيان و اضرار و ستم به فرد و اجتماع، و ضابطه انفاق و احسان را كرامت و سخاوت بدور از بخل و امساك و نيز بدور از اسراف و زيادهروى قرار داده است و بالاخره تحكيم بنيان اقتصادى جامعه و ميانهروى مطلوب و مورد تاكيد شارع مقدس اسلام است.
۲ - اسراف در غيرمال
الف) اسراف در قتل; در دوران جاهليت رسم بر اين بود كه هرگاه كسى از روى ظلم و تعدى به قتل مىرسيد بستگان مقتول با توجه به خوى و خصلت جاهلى و حس كينهتوزى و انتقامجويى چند نفر از بستگان قاتل را به قتل مىرساندند. قرآن كريم اين تجاوز و انتقامجويى را مردود دانسته و فرمود: «فلا يسرف فى القتل» (۲۱) . اما در قتل اسراف نكنيد، يعنى، براى قتل يك نفر، فقط يك نفر را به قتل برسانند آن هم با توجه به صدر آيه كه مىفرمايد: «ولا تقتلوا النفس التى حرم الله الا بالحق»، نفسى را كه خداوند حرام كرده است نكشيد مگر از روى حق، يعنى اين كشتن هم فقط در مواردى تجويز شده است كه قاتل مستوجب كشته شدن باشد و با علم و عمد مرتكب قتل نفس شده باشد.
ب) اسراف در نفس; كسى كه از نظام اعتدال خارج مىشود و با ارتكاب گناه و معصيت از حريم انسانى خود تجاوز مىكند اسرافكار است، اما اسرافكارى كه مشمول پيام رحمت و اميد الهى قرار گرفته است: قل يا عبادى الذين اسرفوا على انفسهم لاتقنطوا من رحمة الله ان الله يغفر الذنوب جميعا انه هو الغفور الرحيم. (۲۲) بگو اى بندگان من كه بر خود اسراف و ستم كردهايد از رحمتخداوند نوميد نشويد كه خدا همه گناهان را مىآمرزد.
ملاحظه مىشود كه هرگونه گناه و تجاوز از حد و مرز و حريم انسانى اسراف بر نفس شمرده مىشود.
در جاى ديگر مىبينيم، مجاهدان جنگ احد به درگاه خداوند متعال دست نياز برمىداشتند: و ما كان قولهم الا ان قالوا، ربنا اغفرلنا ذنوبنا و اسرافنا فى امرنا و ثبت اقدامنا وانصرنا على القوم الكافرين (۲۳) گفتار آنها فقط اين بود كه پروردگارا گناهان ما را ببخش و از تندرويهاى ما در كارها چشم بپوش، قدمهاى ما را ثابتبدار، و ما را بر جمعيت كافران پيروز بگردان.
از آيه شريفه مستفاد مىشود، آنچه از آن عدول كرده و بجا نياوردهاند اطاعت امر پيامبر(ص)، و سستى و منازعه بوده است.
هر نوع گناه، اسراف و تجاوز از حد فطرى و طبيعى انسان است كه با ارتكاب آن از مسير اعتدال بيرون مىرود و به راه زوال و نيستى كشانده مىشود و اين درستخلاف آن هدف عالى است كه انبياى الهى براى آن مبعوث شدهاند. قرآن در اين مورد مىفرمايد: ولقد جاءتهم رسلنا بالبينات ثم ان كثيرا منهم بعد ذلك فى الارض لمسرفون; (۲۴) و رسولان، با دلايل روشن به سوى بنىاسرائيل آمدند، اما بسيارى از آنها بر روى زمين تعدى و اسراف كردند. در اين آيه شريفه مراد از «مسرفون» كسانى هستند كه از انبيا و طريق حق تبعيت نكردند و در نتيجه اين سركشى به گناه آلوده شدند.
معيار اسراف
احاديثى از حضرت امام صادق(ع) نقل است كه در مورد اسراف به اصحاب مىفرمايند: كمترين حد اسراف اين است كه لباسى را كه بيرون خانه براى حفظ آبرو مىپوشى در داخل خانه نيز بپوشى يا باقيمانده آب و غذا را كه در ظرف مىماند دور بريزى و يا خرما را خورده و هسته آن را دور اندازى. (۲۵) در بعضى از احاديث آمده است كه در هنگام وضو گرفتن بايد مواظب باشيم كه دچار اسراف نشويم و مقدار يك مد (معادل سه چهارم ليتر) آب براى وضو كفايت مىكند. و نيز در ذيل آيه شريفه ۳۱ سوره اعراف: «كلوا و اشربوا...» احاديثى از حضرت امام صادق(ع) نقل شده است كه از آن جمله اين حديث است كه «عياشى از ابان بن تغلب» از آن حضرت نقل مىكند كه مال و ثروت از آن پروردگار است كه آن را در نزد مردم به امانت گذاشته است و به آنها اجازه فرموده كه در حد اعتدال و ميانهروى بخورند و بياشامند و لباس بپوشند، و نكاح كنند، مركب سوارى داشته باشند و مازاد آن را به فقراى مؤمنين ببخشند و بدينوسيله اختلافات طبقاتى را از بين ببرند و پراكندگيها را ترميم كنند و كسى كه اينگونه عمل مىكند، آنچه را كه مىخورد و مىآشامد، اعمالش مباح است و نكاح او و استفاده از مركوبش نيز حلال مىباشد و كسى كه از اين حد تجاوز كند بر او حرام است و سپس فرمود كه اسراف نكنيد كه خداوند مسرفان را دوست ندارد.
از فرمايش امام(ع) كه نظرشان را به صراحت اعلام و مىفرمايند: «من عدا ذلك كان عليه حراما» (۲۶) حرمت اسراف به وضوح آشكار مىشود و وقتى از حد متعادل و مشخص كه در اين حديثشريف بدان تصريح شده تجاوز شد به حرمت مىانجامد و به دليل اينگونه احاديث و يا به دليل نهى صريح قرآن (لاتسرفوا) اسراف و تبذير نوعى حريمشكنى و عصيان در برابر امر پروردگار و از گناهان كبيره محسوب مىشود. در حديثى ديگر مىفرمايد: «كسى كه چيزى را در غير اعتخدا انفاق كند او مبذر است و كسى كه در راه خدا چيزى را انفاق كند او مقتصد است. (۲۷) در اين جا معلوم مىشود كه بذل و بخشش اگر به قصد و نيت الهى نباشد حكم اسراف را دارد و اصولا از ديد اسلام چنين عملى اخلاقى و پسنديده نيستحال كه بحث اخلاقى به ميان آمد متناسب است تا اشارهاى اجمالى بكنيم به اين كه چگونهعملى، از نظر اسلام مقبول است.
عمل اخلاقى از ديدگاه اسلام
اسلام عملى را خير و اخلاقى مىداند كه داراى دو جنبه باشد. به اين معنى كه هر عمل از روح و نيت «حسن فاعلى» و شكل و صورت «حسن فعلى» تشكيل شده است و عمل خير بايد حسن فعلى داشته باشد يعنى صورت و شكل عمل صحيح باشد. مثلا كسى كه مالى را از راههاى نامشروع جمع كرده و با اين مال به قصد قربت اقدام به خيرات و مبرات مىنمايد از او پذيرفته نيست و يا مال مباح و مشروع را خواسته باشد براى ريا و خودنمايى و در غير رضا و طاعت پروردگار انفاق و بخشش كند اينجا هم مردود است و بنا به نظر حضرت امام صادق(ع) چنين كسى مبذر و مسرف است.
معيار و ملاك هزينهها
اصولا توجه به اين نكته ضرور است كه هر كس چقدر حق هزينه دارد كه وقتى از آن حد گذشت مشمول اسراف مىشود و بايد از آن خوددارى نمايد، به اعتبارى مصرف و مخارج زندگى را مىتوان به دو قسم تقسيم نمود، مخارج روا و مخارج ناروا، قضاوت در مورد روا و ناروا بودن مخارج با عرف و افراد اجتماع است. همانطور كه قضاوت در مورد اباحه و حرمتبه دستشرع است، هر كس براساس ايمان و عدل اسلامى موظف است زندگى خويش را طبق شان و موقعيتى كه در اجتماع دارد تنظيم كند (البته اين با معنى مساوات اسلامى منافاتى ندارد، زيرا اين تفاوت براساس تفاوت در شهرت و ضعف استعداد و ميزان تلاش و فعاليت هر كس و مراحل مختلف افراد است) مثلا در باب خمس داريم كه افراد در مورد منافع كسب بايد مخارج سالانه خود را طبق شان تامين كنند و آنچه از اين معيار اضافه باشد مشمول خمس مىشود و يا در باب زكات شرط است كه نيازمندانى مىتوانند آن را دريافت نمايند كه هزينه لباس و غذا و ساير مخارج ضرور زندگى آنان تامين گردد و توسعه يابد تا همسطح ساير افراد قرار گيرند.
در مورد نفقه زن كه بر عهده شوهر است معيار چنين است كه مرد خوراك و پوشاك زن را در حد شايسته و شرافتمندانه كه در خور شان و موقعيت اجتماعى اوست تامين نمايد در اين زمينه قرآن مجيد مىفرمايد: «و على المولود له رزقهن و كسوتهن بالمعروف لاتكلف نفس الا وسعها» (۲۸) بر آن كسى كه فرزند براى او متولد شده (پدر) لازم استخوراك و پوشاك مادر را به طور شايسته و در مدت شيردهى بپردازد حتى اگر طلاق گرفته باشد، هيچ كس موظف به بيش از مقدار توانايى خود نيست.
مىبينيم آن قسمت از مخارج و هزينههايى كه با موقعيت اجتماعى و شؤون زندگى انسان موافق و سازگار است اقتصاد و تقدير معيشت است و آنچه از اين حد و مقدار تجاوز كند، اسراف و زيادهروى است و موجب غضب پروردگار خواهد بود. لازم به تذكر است كه شايد نتوان معيار و مقدار معينى براى اسراف در نظر گرفت. بلكه اسراف مفهومى است كه در افراد مختلف و اوضاع گوناگون و اجتماعات مختلف مصاديق متفاوت و مختلفى مىيابد، مثلا ممكن است پوشيدن لباس و يا خوردن غذايى خاص در شرايطى كه در جامعه نيازمند و محتاج وجود ندارد اسراف نباشد لكن همان پوشاك و خوراك در جامعهاى فقير و يا زمانى خاص زيادهروى و اسراف محسوب شود و اين خود توجه دادن ثروتمندان استبه اين كه مسايل مهمتر را در نظر بگيرند و بر تمام ابعاد زندگى خود را زير نظر گيرند و احساس مسؤوليت كنند و بدانند كه همگان در پيشگاه ايزد متعال مسؤولند; مسؤول در برابر خود و جامعه خود. غنى بايد در فكر فقير و رفع نيازهاى او باشد كه در تعاليم اسلام بر اين مساله تاكيد فراوان شده است و براى نمونه علاوه بر آيات شريفه قرآنى كه وارد شده استبه اين كلام مشهور حضرت رسول۹ اكتفا مىشود كه فرمود: «من اصبح و لا يهتم بامور المسلمين فليس بمسلم»، پس بايد غنى در فكر فقير و در راه رفع حوايج او باشد و افراد كم درآمد در مرز خود حركت كنند تا امتيازهاى نابجا از ميان برود و اصول در جامعه رشد كند و بحرانهاى اقتصادى پديد نيايد.
اسراف موجب تنگدستى و فقر است و ميانهروى مايه توانگرى
در حديثى از امام على(ع) آمده است كه «القصد مثراة و السرف مثواة» (۲۹) يعنى اقتصاد و ميانهروى موجب ثروتمندى و اسراف و ولخرجى موجب سقوط و فقر مىگردد و نيز امام زينالعابدين(ع) از رسول خدا(ص) نقل مىفرمايد كه فرمود: «ثلاث منجيات فذكر الثالث القصد فى الغنى و الفقر» (۳۰) حضرت رسول سه عامل براى نجات معرفى مىفرمايند كه سومين آن ميانهروى و اعتدال در توانگرى و نيازمندى است. پس افراد توانگر هم حق ندارند به بهانه اين كه امكانات مالى وسيع دارند به اسراف پردازند. نكته مهمى كه از اين حديث استنباط مىشود اين است كه اسراف و تبذير موجب فقر و تنگدستى است.
اسرافى كه هميشه حرام است
سه قسم اسراف است كه در همه جا و در همه حالات حرام است و اختصاص به شخص يا زمان، يا جاى خاصى ندارد.
۱ - ضايع كردن مال و بىفايده كردن آن، هر چند آن مال كم باشد. مانند بقيه ظرف آب را ريختن در جايى كه آب كمياب باشد و به آن مقدار رفع نياز مىگردد. يا لباسى را كه قابل استفاده شخصى يا ديگران است، پاره كردن و يا دور انداختن و يا خوراكى را نگهداشتن و به ديگرى ندادن تا اين كه ضايع و تباه شود و يا دادن مال به دست صغيرى كه آن را تلف مىكند و نظاير اينها.
حضرت صادق(ع) ميوه نيمخوردهاى را ديدند كه از منزل ايشان بيرون انداخته شده بود. آن حضرت ناراحت و خشمگين شدند و فرمودند اين چه كارى است كه كرديد؟ اگر شما سير شدهايد بسيارى از مردم هستند كه سير نشدهاند، پس به آنهايى كه نيازمندند بدهيد. متاسفانه در حال حاضر مىبينيم در جامعه اسلامى، چه مقدار از غذاها و يا ميوههايى كه قابل استفاده است در سطلهاى آشغال و زبالهدانها ريخته مىشود! در حالى كه افراد بسيارى به آن نياز دارند. نسبتبه دور ريختن تتمه طعام بخصوص خرده نان (مگر در صحرا براى حيوانات) روايات تهديدآميزى رسيده است كه ذكر آنها موجب طول كلام است.
خوردن چيزهاى مضر هم اسراف است
۲ - از موارد اسراف، صرف كردن مال است در آنچه به بدن ضرر برساند، از خوردنى و آشاميدنى و غير آنها مانند خوردن چيزى پس از سيرى هر گاه مضر باشد. چنانچه صرف مال در آنچه كه براى بدن نافع و به صلاح آن است، اسراف نيست.
صرف كردن مال در محرمات اسراف است
۳ - صرف كردن مال در مصرفهايى كه شرعا حرام است، مانند خريدن شراب و آلات قمار و اجرت فاحشه و خواننده و رشوهدادن به حكام و صرف نمودن مال در چيزى كه ظلمى در بردارد يا ستمى به مسلمانى مىرساند و نظير اينها، و در چنين مواردى از جهت مخالفت امر خدا معصيت است، يكى گناه بودن اصل عمل و يكى اسراف بودن صرف مال در آن موارد.
رابطه اسراف و اتلاف مالكيت
در اسلام مالكيتى كه از راههاى مباح حاصل شده باشد محترم شمرده شده است و جز در مواردى خاص كه در فقه اسلامى مقرر شده از مالك سلب مالكيت نمىشود. در اين جا لازم است اين نكته روشن شود كه مالك حق اتلاف را ندارد و حق تصرف تا مرز اتلاف پيش نمىرود، اگر مالك بخواهد ملك خويش را تلف كند نوعى «اعراض» تلقى مىشود به طورى كه آن مال بكلى از مالكيت او خارج مىشود و رابطه مالكيتشخص با آن چيز از بين مىرود. «اعراض» يكى از عوامل سلب مالكيت است. اتلاف مال گناه است و تلفكننده اصولا در ملك خداوند تصرف نابجا كرده است. به عنوان مثال: شخصى از بالاى پشتبام ليوان خود را به قصد شكستن مىاندازد. اگر ديگرى در بين راه آن را بگيرد صاحب آن ليوان كدام يك از آن دو هستند؟ اين بحثى حقوقى است كه در فقه نيز مطرح است، شخص پرتاب كننده ليوان رابطه مالكيتخود را با ليوان قطع كرده است و اين «اعراض» نام دارد در حالى كه اگر او حق داشتشاهد تلف شدن مال خويش باشد اين رابطه قطع نمىشد و قطع شدن رابطه مالكيتبه صرف اين عمل بدين معنى است كه او حق اتلاف ندارد. با اولين اقدام شخص «براى اتلاف مال خود» دو مساله به وجود مىآيد: يك گناه تكليفى و ديگر اثر حقوقى كه همان قطع مالكيت اوستبه گونهاى كه اگر فرد ديگرى آن مال را از تلف شدن نجات دهد مالك آن مىگردد.
صراط مستقيم
در جامعه اسلامى براساس نگرش خاص اسلام بايد تمام حركتها و روشها در كليه شؤون و ابعاد حياتى در مسيرى ويژه قرار گيرد كه در اصطلاح خاص مكتبى از آن صراط مستقيم و طريقه وسطى، سواءالسبيل يا راه ميانه و خط عدالت تعبير مىشود، صراط مستقيم راهى است كه خداوند متعال براى انسان در نظر گرفته و از اين راه است كه انسان مىتواند به كمال لايق خود برسد و گذشتن از آن توام با سلامت و عافيت از پل صراط در جهان ديگر است، و آن خط و مسيرى است كه در دو لبه پرتگاه سقوط در دره هولناك بدبختى هلاك و عذاب واقع شده است. راهروان اين صراط به هر طرف بلغزند خواه چپ يا راست، به جانب افراط و تفريط، جلو افتادن از ديگر رهروان يا عقب ماندن، تهور و بيباكى يا جبن و ترس بىمورد، پرگويى يا سكوت و بالاخره خواه لغزش به سوى اسراف و اتراف و تبذير باشد يا به سوى بخل و امساك و تقتير، در هر حال گمراهى است و انحراف و شقاوت. حضرت على(ع) مىفرمايد: «اليمين والشمال مضلة والطريق الوسطى هى الجادة» (۳۱) راست و چپ گمراهى است و راه راست جادهاى است غيرقابل انحراف و به تعبير ديگر، رهرو واقعى اين طريق خود حضرت على(ع) در جاى ديگر مىفرمايد: «و من اخذ يمينا و شمالا ذموا اليه الطريق» (۳۲) هر كس به سمت راست و چپ برود مذمتش كرده و از تباه شدن و مفسده برحذرش داريد. و نيز آن حضرت در مورد مفسدهگران مىفرمايد: «و اخذوا يمينا و شمالا» (۳۳) مفسدين با پيش گرفتن راههاى گمراهى راست و چپ از صراط مستقيم هدايت، چشم پوشيده و محروم شدند بنابراين روشن است كه اسراف و تبذير و بخل و تقتير در صراط مستقيم مكتب اسلام جايى ندارد و خروج از راه تعادل است، ولخرجى و ريختوپاشهاى متكبرانه بر روش مترفين و نازپروردگان لغزش و انحراف به سمت راستبوده و بخل و تقتير و امساك، سقوط در جهت چپ و جذب شدن به اصحاب شمال مىباشد. در اين مطلب توجه به اين نكته ضرور است كه انسان منهاى هدايت آسمانى و مكتب وحى طبعا يا بخيل است و يا اهل اسراف و تبذير، «و كان الانسان قتورا» (۳۴) انسان سختگير است; همانگونه كه ظالم و نادان است. «انه كان ظلوما جهولا» (۳۵) و اين هدايت تشريعى الهى است كه او را از اين طبيعت و خصلتهاى پستحيوانى نجات مىدهد و لذا خداوند متعال در آيات كريمه قرآنى جهت رهايى از افراط و تفريط و نجات از پستيها و خستهاى نفسانى راه هدايت و تربيت را براى انسان هموار كرده است و مىفرمايد: «بندگان خداى رحمان آنان هستند كه هنگام انفاق اسراف نكرده و بخل هم نورزند بلكه در اين ميان راهى استوار، معتدل و براساس عدالت پيش مىگيرند». (۳۶)
پس بهطور كلى و بويژه از بعد اقتصادى كه مورد بحث ما است، بيجا و ناروا مصرف كردن و تلف كردن نعمتهاى الهى، محروم كردن جامعه از آن نعمتها است، لذا مىبينيم كه قرآن كريم چگونه به موارد مختلف آن اشاره مىفرمايد: «خداوندت مسرفين را دوست نمىدارد» (۳۷) و «مسرفين قابل هدايت نبوده و بسيار دروغگويند» (۳۸) و «اهل هلاكت و گمراهىاند و نجات ندارند» (۳۹) و «اهل ترديد و شك و ريبند» (۴۰) ، «اهل آتشند» (۴۱) و «قابل پيروى نيستند.» (۴۲)
چون بناى اسلام بر صراط مستقيم است از جهت ديگر، قرآن مجيد، بخل و امساك و تقتير را هم مورد نكوهش قرار داده و مثلا مىفرمايد: «الذين يبخلون و يامرون الناس بالبخل و يكتمون ما اتيهم الله من فضله» (۴۳) آنان كه بخل مىورزند و مردم را به بخل وامىدارند و آنچه خدا از فضل خود به آنان بخشيده كتمان مىكنند «به مردم استفاده نمىرسانند» به كيفر خود خواهند رسيد.
چرا مسرفين مبغوض خدا و مبذرين برادران شيطان شمرده شدهاند؟
علت اين مطلب را بايد در جهانبينى و اعتقادات اسلامى جستجو كرد و تبيين آن در مورد مسرفان مىتواند چنين باشد كه خداوند امر به عدالت و احسان مىكند و طبعا صاحبان عدالت را دوست مىدارد. «ان الله يامر بالعدل و الاحسان» و از آنجا كه اسرافكاران از اين فرمان سرپيچى كرده و بيعدالتى در مصرف را پيشه خود ساختهاند قهرا مورد خشم و دشمنى خداوند قرار خواهند گرفت، ولى در مورد تبذيركاران علت همدستبودن و شباهتشان به شيطان را از آيه شريفه مىتوان استنباط كرد آن جا كه مىفرمايد: مبذران برادران شيطانند و تعبير برادر در لغت عرب به معنى مشابه و نظير هم مىآيد و شيطان در برابر پروردگارش ناسپاس است، و از طرف ديگر تبذير به معناى ضايع كردن نعمتهاى خداوند است و خود نوعى ناسپاسى است نسبتبه آن نعمتها; و شيطان نخستين فردى است كه همه چيز را ناديده گرفت و تمرد از فرمان خدا كرد و راه ناسپاسى را باز نمود، لذا آنها كه مبتلا به اين خصلت ناروا باشند از همكاران و همدستان شيطان خواهند بود و از آنان با عنوان برادران شيطان ياد شده است و اين است رمز تعبير زيباى قرآن.
درسى از رسول خدا(ص)
در كتاب تحفالعقول آمده است: «جاء الرجل بلبن و عسل لشربه فقال(ص): شرابان يكتفى باحدهما عن صاحبه لا اشربه و لا احرمه و لكنى اتواضع لله; فانه من تواضع لله رفعه الله و من تكبر وضعه الله و من اقتصد فى معيشته رزقه الله و من بذر حرمه و من اكثر ذكر الله آجره الله» (۴۴) مردى شير و عسل براى پيامبر(ص) آورد تا بنوشد فرمود: دو نوشيدنى كه يكى از ديگرى كفايت مىكند من آن را نخورم و حرام هم نمىكنم ولى براى خدا تواضع مىكنم. زيرا هر كه براى خدا تواضع كند خدايش بالا برد و هر كه تكبر كند خداوند او را خوار سازد و هر كه در زندگى ميانهروى كند خدايش روزى دهد و هر كه زيادهروى كند خداوند او را بىنصيب گرداند و هر كه خدا را بسيار ياد كند خدايش جزا دهد.
نكاتى كه در اين حديثشريف است مستلزم بحثى مفصل و هر كدام راهگشاى سعادت دنيا و آخرت است اما مناسب با اين مقال آن است كه پيامبر(ص) مىفرمايند: رعايت اقتصاد و ميانهروى در معيشتباعث ازدياد روزى و نزول بركات الهى است و فردى كه رعايت اعتدال مىكند دچار فقر و تنگدستى نمىشود و برعكس كسى كه طريق اسراف و تبذير پيش گيرد دچار محروميت مىشود و خداوند چنين بندهاى را به سختى معيشت مبتلا مىسازد.
امام صادق(ع) فرمود: «چهار دسته هستند كه دعايشان مستجاب نمىشود: اول) كسى كه در خانه مىنشيند و مىگويد: خدايا به من روزى بده! و در طلب روزى تلاش نمىكند در جواب او گفته مىشود: «الم آمرك بالطلب؟» آيا تو را به طلب روزى دستور ندادم؟
دوم) كسى كه از همسر خود ناراحت است و او را نفرين مىكند، مىفرمايند: «الم اجعل امرها عليك» آيا امر او را به دست تو قرار ندادم؟
سوم) كسى كه مالى داشته و آن را ضايع كرده است، مىگويد: «اللهم ارزقنى» خدايا به من روزى بده! مىفرمايند: «الم آمرك بالاقتصاد؟» آيا تو را به اقتصاد و ميانهروى و اعتدال در خرج امر نكرديم و «الم آمرك بالاصلاح؟» آيا به تو دستور اصلاح در مال را نداديم؟
چهارم) كسانى كه از مال خود بدون شاهد به ديگران وام دهند و بعد وامگيرنده منكر شود، خداوند مىفرمايد: «الم آمرك بالشهادة؟» (۴۵) آيا به تو دستور نداديم شاهد بگيرى؟
ملاحظه مىفرماييد كه با وجود اسراف و شاهد نگرفتن در پرداخت وام، دعا فايدهاى ندارد.
آثار سوء اسراف
الف) زيانهاى فردى
اسرافكار، علاوه بر زيانهاى اقتصادى كه بر جامعه و ملت تحميل مىكند، براى خود نيز زيانهاى جبرانناپذيرى به بار مىآورد:
۱ - خشم الهى; اسرافكار چون تعادل و توازن اقتصادى جامعه را برهم مىزند، از رحمتخدا بدور و گرفتار خشم خدا مىشود، همانگونه كه در قرآن مجيد آمده است: «انه لايحب المسرفين» (۴۶) خداوند اسرافكاران را دوست نمىدارد، و امام صادق(ع) فرمود: «ان السرف امر يبغضه الله» (۴۷) اسراف مورد غضب خداست.
۲ - محروميت از هدايت; خداى متعال كه همواره درهاى رحمتش بر بندگان گشوده استخود را «غافر الذنب و قابل التوب» (۴۸) معرفى كرده است لكن نسبتبه اسرافكاران مىفرمايد: «ان الله لا يهدى من هو مسرف كذاب» (۴۹) همانا خداوند كسى را كه اسرافكار و دروغگوست هدايت نمىكند.
۳ - فقر; روشنترين اثر اقتصادى اسراف، فقر است، زيرا كه اسرافكار در اثر مصرف نارواى خود هم جامعه را به ورطه فقر مىكشاند و هم خود دچار فقر مىشود. لذا يكى از راههاى مبارزه اسلام با فقر و محروميت ايجاد هماهنگى اقتصادى و ريشهكن ساختن اسراف است. حضرت على(ع) مىفرمايند: «القصد مثراة و السرف متواة» (۵۰) اقتصاد و ميانهروى باعث توانگرى و اسراف و ولخرجى مايه فقر و تنگدستى است. و نيز فرمود: «سبب الفقر اسراف» (۵۱) ولخرجى عامل فقر است.
۴ - هلاكت; اسراف از هر نوعى كه باشد انسان را به نابودى مىكشد. قرآن مجيد اين حقيقت را چنين بيان مىفرمايد: «ما به وعدههايى كه به انبياء و اوليا داديم وفا كرديم و سپس آنها را با هر كه اراده كرديم نجات داديم، اما مسرفان و ستمگران را هلاك كرديم» (۵۲) و نيز حضرت على(ع) مىفرمايد: «كثرة السرف تدمر» (۵۳) اسرافكارى زياد انسان را به هلاكت مىكشاند.
۵ - كيفر اخروى; كيفر كسانى كه از حدود الهى تجاوز كرده و اوامر و نواهى خدا را ناديده گرفته باشند، تنها فقر و تنگدستى در دنيا نيستبلكه عذاب اخروى نيز در انتظار آنان است. قرآن مجيد در اينباره مىفرمايد: «و كذلك نجزى من اسرف و لم يؤمن بآيات ربه ولعذاب الآخرة اشد و ابقى» اين چنين جزا مىدهيم كسى را كه اسراف كند و ايمان به آيات پروردگارش نياورد، عذاب آخرت شديدتر و پايدارتر است، و در جاى ديگر مىفرمايد: «و ان المسرفين هم اصحاب النار» براستى كه مسرفان اهل دوزخند. به اين ترتيب معلوم است كه وضع افرادى كه در مسير باطل و هرزگيها دچار اسراف مىشوند چه خواهد بود!
ب) زيانهاى اجتماعى اسراف
البته از نظر اسلام، هر كس مالك حاصل كار و دسترنجخود - با رعايتحدود شرعى - مىباشد ولى انسان نمىتواند به بهانه اين كه مالك مالى است هر طور كه بخواهد آن را صرف و خرج كند بلكه دو شرط اساسى دارد: يكى بهرهگيرى براى خود و ديگرى بهرهدادن به ديگران و تعطيل اينها دو صورت مىتواند داشته باشد:
۱ - ثروتاندوزى و تكاثر كه نه خود از آن بهرهمند شود و نه ديگران.
۲ - صرف مال در راه هوا و هوس و اسرافكارى، كه هر دو ممنوع و داراى پيامدهايى به شرح زير مىباشند:
۱) حقناشناسى، وجدان هر انسانى اين مطلب را پذيراست كه در برابر هر احسانى بايد تشكر كرد و اخلاق اجتماعى نيز حكم مىكند كه در مقابل هر نيكى بايد حقشناس و سپاسگزار باشيم، از احسان و نيكى پدر و مادر، استاد و معلم تا خالق مهربان.
«لئن شكرتم لازيدنكم و لئن كفرتم ان عذابى لشديد» (۵۴) اگر شكر نعمت را بجا آوريد، فزونى دهيم و اگر كفران نعمت كنيد مجازاتم شديد است.
۲ - تزلزل و سستى، انسانهاى معتدل در فراز و نشيبهاى زندگى هرگز نمىلغزند ولى افراد اسرافكار كه ولخرجى و مصرفزدگى تمام ابعاد زندگيشان را فراگرفته چون روحيه مقاومت ندارند، شكستخورده و متزلزل خواهند بود.
۳ - كاهش توليد، جامعه مصرفى رفتهرفته قدرت توليد را از دست مىدهد و براى تامين مايحتاج خود به بيگانه روى مىآورد. اين مطلبى است كه در دوران حكومت طاغوت براى همه ثابتشده و نياز به توضيح ندارد.
۴ - سقوط اخلاقى، ولخرجى و ريختوپاشهاى نابجا و بىمورد، انسان را از مسير صحيح بيرون آورده و به ورطه هولناك فساد و تباهى مىكشاند، انسان اسرافكار گاهى به مرحلهاى مىرسد كه به هر پستى تن مىدهد; رشوه مىگيرد، دروغ مىگويد، ربا مىخورد، به عناوين مختلف، عفت و شخصيتخود را از دست داده و سرانجام كارش به رسوايى مىكشد.
كيفر كسانى كه از حدود الهى تجاوز كرده و اوامر و نواهى خدا را ناديده گرفته باشند، تنها فقر و تنگدستى در دنيا يستبلكه عذاب اخروى نيز در انتظار آنان است.
۵ - ضعف ايمان، اسرافكارى آدمى را از راه اعتدال خارج مىكند و به سستى ايمان و ضعف عقيده مىكشاند.
۶ - اختلاف طبقاتى، يكى از علل اساسى اختلاف طبقاتى به طور قطع همين اسرافكاريها است. و همچنين وابستگى به بيگانگان و تضييع حقوق ديگران و غفلت از خدا و حريمشكنى را از ديگر پيامدهاى اسراف بايد شمرد. علاوه بر اينها دغدغه خاطر و گرفتاريهاى روحى و بيماريهاى جسمى و روانى از نتايج مسلم ولخرجيها و بىبندوبارىها است.
در پايان بايد عرض كنيم كه اسراف و تبذير دايرهاى وسيع دارد و مصاديق آن نيز متعدد است.
اسراف در اموال عمومى، اسراف در بيتالمال مسلمين، اسراف در مواد غذايى; خوراك، مسكن، وسيله نقليه و نظاير اينها از جمله مصاديق اسراف است. زيانبارتر از همه اسراف در بيتالمال است كه اميرالمؤمنين على(ع) فرمود: «ان اعظم الخيانة، خيانة الامة» (۵۵) بالاترين خيانت، خيانتبه مردم است.
استفاده شخصى از اموال عمومى، علاوه بر اسراف، خيانت است، اسراف در آب و غذا، اسراف در برق و گاز علاوه بر اسرافكارى، خيانتبه مردم است.
شيوه مبارزه با اسراف
نظارت همگانى يا امر به معروف و نهى از منكر، تبليغات و ارائه الگوى صحيح مصرف و سرانجام برخورد عملى و قانونى قاطعانه با اسرافكاران مىتواند كارساز باشد و از اين همه خلاف و اختلاف جلوگيرى كند.
محمدرضا عطايى
عضو هيات علمى دانشگاه آزاد مشهد
پىنوشتها و مآخذ:
۱- بقره /۱۹۱.
۲- مفردات راغب، ص۲۳، ماده سرف.
۳- اعراف /۲۹.
۴- لقمان /۱۹.
۵- فاطر /۳۲.
۶- غررالحكم، فصل۴۹، ص۴۸۳.
۷- نهجالبلاغه فيضالاسلام، خطبه ۱۸۴/۶۱۱.
۸- يونس /۱۲.
۹- شعراء /۱۵.
۱۰- غافر /۲۸.
۱۱- يونس /۸۳.
۱۲- اسراء /۲۶ و۲۷.
۱۳- اعراف /۳۱.
۱۴- انعام /۱۴۱.
۱۵- فرقان /۶۷.
۱۶- اسراء /۲۹.
۱۷- نهجالبلاغه فيض، حكمت ۳۴/۱۱۵۳.
۱۸- نهج الفصاحه، ص۶۰۱.
۱۹- رعد /۸.
۲۰- قمر /۴۹.
۲۱- اسراء /۳۵.
۲۲- زمر /۵۴.
۲۳- آلعمران /۱۴۱.
۲۴- اسراء /۲۹.
۲۵- ميزانالحكمه، ۴/۴۴۸.
۲۶- تفسير برهان، ۲/۱۰.
۲۷- همان، ۲/۴۱۶.
۲۸- بقره /۲۳۳.
۲۹- وسائل، ۱۵/۲۵۸.
۳۰- همان.
۳۱- نهجالبلاغه، خطبه۱۶، ص۶۹.
۳۲- همان، خطبه۲۱۳، ص۷۰۴.
۳۳- همان، خطبه ۱۸۰.
۳۴- اسراء /۱۰۰.
۳۵- احزاب /۷۲.
۳۶- احزاب / مضمون آيه۶۷.
۳۷- اعراف /۳۱.
۳۸- غافر /۳۸.
۳۹- انبياء /۹.
۴۰- غافر /۳۴.
۴۱- غافر /۴۳.
۴۲- شعرا /۱۵۱.
۴۳- نساء /۳۷.
۴۴- تحفالعقول، موعظه ۸۲ از مواعظ النبى(ص).
۴۵- اصول كافى، ج۲، كتاب دعا، ص۲۷۵.
۴۶- انعام /۱۴.
۴۷- وسائلالشيعه، ۱۵/۲۶۲.
۴۸- غافر /۳.
۴۹- مؤمن /۲۸.
۵۰- وسائل الشيعه ۱۵/۲۸۵.
۵۱- فهرست غررالحكم، ص۱۵۹.
۵۲- انبياء /۹۰.
۵۳- فهرست غررالحكم، ص۱۹۵.
۵۴- ابراهيم /۷.
۵۵- نهجالبلاغه دكتر صبحى صالح، نامه۲۶.
عنوان /// معناي واژه /// تعداد
اِثم / گناه ، محروم شدن از پاداش / 48 بار در قرآن
جُرم / عملي كه آدمي را از هدفش جدا ميكند / 61 بار در قرآن
حرام / منع و ممنوعيّت / 75 بار در قرآن
حِنث / تمايل به باطل ، مانند پيمانشكني و تخلّف / 2 بار در قرآن
خَبط / حركت نامتعادل همراه با سستي و سقوط / 1 بار ( 775 / بقره )
خَطيئة / گناه غير عمدي ، گناه بزرگ / 22 بار در قرآن
ذنب / هر نوع عمل خلافي كه مجازات دنيوي و اخروي دارد / 35 بار در قرآن
سيّئة سوء / كار زشت و قبيحي كه موجب اندوه است / 165 بار – 44 بار در قرآن
شرّ / هر زشتي و بدي كه مردم از آن نفرت دارند / 1 بار در قرآن ( 8 / زلزال )
فاحشة / كار بسيار زشت ، ننگين و نفرتآور / 24 بار در قرآن
فُجُور / پاره شدن پردهي حيا و آبرو كه باعث رسوايي مي شود / 6 بار در قرآن
فَساد / خروج از حدّ اعتدال / 50 بار در قرآن
فِسق / خروج گناه كار از مدار اطاعت و بندگي خدا / 53 بار در قرآن
لَمَم / نزديك شدن به گناه ( به گناهان صغير اطلاق مي شود ) / 1 بار در قرآن ( 32 / نجم )
مَعصيت / سرپيچي و خروج از فرمان خدا / 33 بار در قرآن
مَنكر / زشت و ناپسند / 16 بار در قرآن
وِزر و ثقل / سنگيني ( بيشتر در مورد عمل گناه ديگران به كار مي رود ) بار سنگين ، بار گناه / 26 بار در قرآن ( عنكبوت / 13 )
خداوند متعال در سوره ماعون می فرماید: «أرأیت الذی یکذب بالدین * فذلک الذی یدع الیتیم * ولا یحضّ علی طعام المسکین * فویل للمصلین * الذین هم عن صلاتهم ساهون * الذین هم یراؤون» (ماعون / 1 – 6). یعنی آن کسانی که در نماز خود ریا می کنند. در مورد تفسیر این آیات از امام علی (ع) روایت شده است که آن حضرت فرمود: ریاکاران در نماز آن کسانی هستند که در پیش چشم مردم نماز می خوانند تا مردم ایشان را ببینند و به ایشان نگاه کنند و گمان کنند که ایشان نیز در خط ایمان حرکت می کنند و به ستایش ایشان بپردازند.
البته تفسیری فراگیرتر از این هم وجود دارد و آن این است که تکیه روی نماز به خاطر این است که نماز بارزترین مصادیق عبادت است. و گرنه ریا به نماز اختصاص ندارد. بلکه همان گونه که آیات کریمه به شخصیت ریاکاران اشاره می دارند اینان رویکردی الهی ندارند و نسبت به خدا اخلاصمند نیستند و به دنبال رضایت خداوند هم هم نمی باشند. تمام اعمال نیکی که انجام می دهند برای این است که مردم آنان را بستایند و در بین مردم نام نیکی از آنان شایع شود تا از این طریق بتوانند بعضی از خواسته های خود نایل شوند. از این رو عبارت «الذین هم یراؤون» در بعضی از تفاسیر اینگونه تفسیر شده است، کسانی که نماز می خوانند و کارهای نیک انجام می دهند و در کارهای عمومی مشارکت می کنند تا مردم ایشان را ببینند و کارشان به هیچ وجه برای کسب رضایت الهی نیست. چرا که ایشان فاقد عمق معنوی و عبادی لازم برای عمل صالح هستند و به مسائل نگاهی سطحی دارند.
این برداشت ریشه در یک قاعده اسلامی برای کلیه اعمال دارد و آن این که عمق و راز و عنوان کلیه اعمال تابع نیّت است. در حدیث شریف از پیامبر (ص) آمده است: «إنّما الاعمال بالنیّات ولکل أمریء مانوی». روایت شده است که پیامبر (ص) خدا چنین ادامه داد: «پس هر کس جنگ کند – ایشان به یکی از جنبه های جهاد اشاره می فرماید – به امید آن چه که نزد خداوند است، پاداش او بر عهده خداوند عزوجل است و هر کس برای چیزهای دنیوی جنگ کند – هدفش از این جنگ این باشد که پس از پیروزی به غنیمت برسد و منظورش خداوند متعال نباشد – برای او چیزی جز نیتش نخواهد بود.»

